October 23, 2017

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी की अदला बदली कर रहे हैं। 

उन्होंने मालखाने के ताले पर गहरी निगाह डाली है। इसके बाद चाबियों के गुच्छे की खनक के साथ चुप्पी टूट जाती है। दूर तक एक बीत चुके दिवस की स्मृति पसर जाती है।
जैसे खाली प्याले के भीतर चाय की याद।
* * *

मेरे गालों पर लाल लकीरें खींचने फिर सर्दी आएगी।

दस्तानों में अंगुलियां डालते मुझे एक गार्ड देख रहा होगा। जाने कितनी ही बार की कोशिश के बाद स्टार्ट होगा स्कूटर। तब तक शिफ्ट के बाकी लोग पहुंच चुके होंगे पास की कॉलोनी में अपने घर।

पहले मोड़ पे छूकर गुज़रेगी बर्फ। मैं सोचूंगा कि क्या इस वक़्त भी कोई क़ैदी जागता होगा जेल में। कुछ दूर आगे एसपी साहब की हवेली से आती होगी व्हाइट स्पायडर लिली के फूलों की मादक गंध। जिलाधिकारी के घर से दिख जाएंगे आदमकद स्वामी विवेकानन्द, अस्पताल जाने वालों को निर्विकार देखते अपने हाथ बांधे हुए।

मैं स्कूटर धीरे चलाऊंगा। मैं लम्बी सांसें लूंगा। मैं देखूंगा दूर तक कि कोई नहीं है और रास्ते सूने पड़े हैं। रात के सन्नाटे ज़िंदा कर देंगे, तन्हा सूना रेगिस्तान। मैं उसे बाहों में भर लूंगा आधी रात को।

हर बार जब भी सर्दियां आएंगी भीड़ छंट जाएगी जल्दी-जल्दी। मुझे रेगिस्तान में भीड़ अच्छी नहीं लगती।

October 22, 2017

तुम्हारे लिए हमेशा

"तुम आ जाओ। तुम्हारा इंतज़ार है।" ऐसा कहने वाले ने आने का रास्ता भी रखा हो, ये ज़रूरी नहीं होता। उसने किसी पुरानी बात को याद करके महज इसलिए कह दिया होगा कि वह ख़ुद को ग़लत साबित न करना चाहता होगा।

हम इस लम्हे को सच जानते हैं। किसी आवेश में कह देते हैं कि तुम्हारे लिए हमेशा हूँ। एक घड़ी में हमारा मन बदल जाता है। फिर हम कभी इतने सच्चे और हिम्मती नहीं होते कि उसे कह दें। अब वो मन न रहा। जाने किस मोह में मैंने ऐसा सोच लिया कि सबकुछ हमेशा के लिए हो सकता है।

बातें और रिश्ते कभी-कभी पारदर्शी कांच बन जाते हैं। उनके आगे का संसार दिखता तो है मगर वहां तक जाने का कोई रास्ता नहीं होता।

हम सम्बन्ध की इति को नहीं स्वीकारते और भँवरे की तरह बन्द रास्ते के पार पहुंचने की आस में वहीं टूट बिखर जाते हैं।

October 20, 2017

इत्ती सी बात है

शाम बुझ गयी है
मैं छत पर टहलता हूँ
अपने चप्पलों से
एड़ी को थोड़ा पीछे रखे हुए।

सोचता हूँ कि
समय से थोड़ा सा पीछे छूट रहा हूँ।

हालांकि फासले इतने बढ़ गए हैं
कि नंगे पांव रुककर
इंतज़ार करूँ, तो भी कुछ न होगा।
* * *

कितना अच्छा होता
कि जूते और चप्पल समय के साथ चले जाते
हम वहीं ठहरे रह जाते, जहाँ पहली बार मिले थे।

फिर सोचता हूँ कि न हुआ ऐसा
तो अच्छा ही हुआ
तुम वैसे न थे, जैसा पहली बार सोचा था।
* * *

क्या होगा अगर हम मिले?
जिस तरह रेल के इंतज़ार में
फाटक बंद रहता है
मन उसकी प्रतीक्षा करता है।

रेल के आने पर
रात में पटरियां चमकती हैं
एक धड़क सुर साधती है।

तपी हुई पटरियां धीरे से ठंडी हो जाती है।

इसी तरह हम क्या करेंगे मिलकर।
कोई रेल की तरह आगे निकल जायेगा
कोई पटरी की तरह इंतज़ार में पड़ा रहेगा।
* * *

मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है
हंसी किसे पसन्द नहीं होती।

तुम में हर वो बात है
कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं
और भाप की तरह उड़ जाऊं।

मगर हम एक शोरगर के बनाये
आसमानी फूल हैं
बारूद एक बार सुलगेगा और बुझ जाएगा।

इत्ती सी बात है।
* * *

पता नहीं वह कौनसा शहर था
शायद मुम्बई ही होगा
मगर ये याद है
कि तुमने कहा था, रम अच्छी है
ये हमारी मदद करेगी।

मुझे रम बिल्कुल नहीं पसन्द
मैंने सब जाड़े व्हिस्की के साथ बिताए।

कैसी बात है न
फिर भी मुस्कुराता हूँ
कि तुम रम पिये हो और मेरे साथ हो।
* * *

October 17, 2017

प्रिय को बदलते हुए देखकर

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा.

बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है.

शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. दफ़अतन कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं.

मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.

इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं.

ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो.

आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी आहट का पता कर आते हैं. चुप्पी है. आँखें मुंदने लगती हैं. कोई साया आहिस्ता से सीढियों को चढ़ता, खुली पतली बालकनी की ओर मुड़ जाता है.

आंखें खुलकर खिड़की को एकटक देखने लगती हैं. कि वह साया दोबारा यही से गुज़रेगा. कोई नहीं गुज़रता. मन कहीं बहुत दूर किसी पुराने भव्य किले के द्वार पर जा बैठता है. बादल गुम गए हैं. दूर तक कड़ी धूप पसरी है. लम्बे दालान का फर्श गरम हो गया है. झरोखे खाली हैं. मेहराबें सूनी है. और कोई नहीं है.

कोई नहीं.

मन सोचता है यहाँ से उठ जाऊं. सामने सूने पड़े आस्ताने तक चला जाऊं. वहां जाकर बैठ जाऊं. एक थकान रगों के रास्ते पूरे बदन में फैल जाती है. कि वहां बैठकर किसका इंतज़ार करना होगा. शाम कब तक आएगी. उसके बाद क्या होगा. क्यों कोई आएगा. कोई आया तो वो कौन होगा. क्या वह मेरे पास किसी खम्भे से पीठ टिकाकर बैठेगा.

गिलहरी अब भी चुप है. नीचे देख रही है. जैसे हम अपने किसी प्रिय को बदलते हुए देखकर, हताशा में ठहर जाते हैं.

October 16, 2017

इतवार का स्वाद

मैं कहता हूँ- "तुम्हारे जैसे स्ट्रीक्स मेरे बालों में होते तो कितना अच्छा लगता." भावना मुझे थोड़ी ज्यादा आँखें खोलकर देखती है. मैं उसे समझाता हूँ कि ये जो तुम्हारे बाल हैं. इनमें दो रंग हैं. ऐसे बाल रंगवाने के लिए लोग पैसे खर्च करते हैं. भावना पूछती है- "कित्ते?" मैं कहता हूँ- "तीन हज़ार से तीस हज़ार रूपये" वह ऐसे हंसती हैं जैसे ऐसा हो ही नहीं सकता.

मैं कहता हूँ- "मुझे चोटी बनाने जित्ते लम्बे बाल अच्छे लगते हैं." भावना कहती है कि उसके भी चोटी बनती थी. अपने सर पर बालों को ऊपर की ओर लम्बा तानते हुए अंदाजा लगाती है- "इत्ती लम्बी तो थी." मैं कहता हूँ- "मैं इससे भी लम्बी चोटी और ऐसे स्ट्रीक्स वाले बाल बनाऊंगा." वह हंसती है. उसे लगता है कि मैं केवल उससे बातें बना रहा हूँ.

मैं अपने फेसबुक प्रोफाइल में अपनी चोटी वाली तस्वीर खोजने लगता लगता हूँ. वह अपनी ताई से कहती है- "ये क्या सब्जी है? उबलते-उबलते ही सौ घंटे लग जायेंगे." ताई कहती हैं- "ये तो अभी बन जाएगी. तेरी मम्मी बनाती है, सौ घंटे में ?" भावना कहती है- "पापा बनाते हैं."

"तो फिर पापा सब्जी बनाने का कहकर सो जाते होंगे."

भावना और ताई के सवाल जवाब सुनते हुए मुझे याद आया कि मेरे पापा तो कभी रसोई में नहीं जाते थे. उन्होंने मुझे बताया था कि कभी एक दो बार उन्होंने रोटी बनाई थी. उन्होंने साग कभी नहीं बनाया था. मगर पापा बाल बनवाने के मामले में बड़े सख्त थे. वे एक ऐसे नाई के पास ले जाते थे. जिसने मेरे दादा जी के भी बाल बनाये थे. प्रताप हेयर ड्रेसर वाले प्रताप चंद, हमारे सर को टेढ़ा नीचा करके बाल बनाना भूल जाते थे.

जब वहां से छूट जाते थे तो लगता था कि ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत है. इस मुक्ति के बाद इतवार का स्वाद, इस दुनिया का सबसे मीठा स्वाद होता था.

October 14, 2017

दफ़्तर के चूहे, बिल्ली और सांप

सांप चूहे खा जाते हैं। इसलिए बिल्लियां उनको पसन्द नहीं करती। वे उनको मार डालती हैं।

हमारा आकाशवाणी वन विभाग के छोर पर बना है तो बहुत सारे सांप आते रहते हैं। विषैले और विषहीन। इधर बिल्लियां भी रहती हैं। वे अक्सर ड्यूटी रूम के सोफे पर सोई मिलती हैं। उनके बच्चे भी सोफे को बहुत पसंद करते हैं। ड्यूटी रूम में आने वाले मेहमानों को अक्सर याद दिलाना पड़ता है कि देखिए बिल्ली के बच्चे हैं। उन पर न बैठ जाना।

एक शाम को उद्घोषक डरी हुई बाहर गेट तक चली आई। सर प्ले बैक स्टूडियो के दरवाज़े पर मैंने सांप देखा। गार्ड ने कहा कि अभी देखते हैं। सांप कहीं इधर-उधर हो गया। वह लौट कर अंदर जाने लगी तो जनाब फिर से दरवाज़े पर रास्ता खोज रहे थे। वह वापस भागी। सांप को फिर हटा दिया गया। वे स्टूडियो में डर रही थी। उनको कहा कि आप मैं तेरी दुश्मन गीत प्ले कीजिये। अमरीश साहब के आने का सोचकर सांप खिसक लेगा।

एक शाम एक उद्घोषक की उद्घोषणा अधूरी रह गयी। माइक से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ भर आई। वे बाहर आये और बोले। सर स्टूडियो के कंसोल पर फेडर्स के बीच एक बिच्छू आ बैठा है। उनको सुझाव दिया कि बिछुआ मोरे साजन का प्यार गीत चला लें। रूमान से भरकर बिच्छू लौट सकता है।

इधर कोबरा का एक परिवार रहता था। एक को ड्राइवर ने मार डाला। बाकायदा अंधविश्वास की जै जैकार करते हुए उसे अग्नि को समर्पित किया गया। एक कोबरा का हमारे इंजीनियर साथी ने बेहद क्रूरता से अंत कर दिया था। मुझे उसका भी गहरा दुख हुआ।

मैं एक शाम स्कूटर के पास पहुंचा तो कोई चीज़ तेज़ी से हिली। कैरेत फेमिली का छोटा सा बच्चा चेतावनी दे रहा था। दूर रहना प्यारे कहानीकार वरना सारी कहानियां यहीं धरी रह जायेगी। मैंने गार्ड को बुलाया और उनसे कहा कि अपना ख़याल रखियेगा। ये छोटे साहब इधर शिकार पर निकले हैं। इनके भाई बहन भी आस पास होंगे।

रेगिस्तान की रात में उमस के बढ़ते ही बिल में दुबके विषधर बाहर चले आते हैं। कई बार उनको स्टूडियो के बाहर तफरीह करते। बिल्लियों से लड़ते हुए, जान बचाकर भागते हुए देखा जाता है। इधर हैज़हॉग भी बहुत सारे हैं। ये झाऊ चूहे कभी पकड़ में आ जाते हैं तो फिर कोई उनसे बहुत देर तक खेलता रहता है। सावधानी से उठाने पर उनके कांटे नहीं चुभते। वे थोड़ी देर बाद अपनी थूथन को बाहर निकाल कर देखते हैं कि कहां फंस गए हैं। तब थ्री इडियट्स का डायलॉग ज़रूरी होता है। तू अंदर ही रहना चैम्प। बाहर बहुत सर्कस है।

इस सांप को कल रात अपनी जान गंवानी पड़ी है। सुबह से स्टूडियो के दरवाजे के पास इसकी देह पड़ी है। मैं इसकी तस्वीर उतार अंदर आकर बैठ गया। देर तक ख़याल रहे। क्या कुदरत है। कैसा जीवन है। मृत्यु जाने कहाँ प्रतीक्षा में बैठी है। इसी सोच में अभी थोड़ी देर पहले बिल्ली भी ड्यूटी रूम की खिड़की से अंदर आई। जैसे ही उसने मुंह अंदर घुसाया तो मैंने उससे कहा- "हत्यारिन कहाँ से आ रही हो?" उसने मुझे इग्नोर किया है और सोफे पर बैठ गयी है।

जालमा तू बड़ा वो है...

October 11, 2017

दूर से आते हुए पिता

पहले तो दिख जाते थे
दूर से आते हुए पिता।

अब धुंधला जाती हैं आंखें
भरी-भरी गली में
नहीं दिखता उनका आना।

कभी-कभी
इससे भी अधिक उदास हो जाता हूँ।

उन पिताओं के बारे में सोचकर
जो इसी तरह जा चुके बच्चों का
भूल से करने लगते होंगे, इंतज़ार।
* * *

मैं सो नहीं सकता हूँ
कि मैं सो गया तो
कौन जागेगा तुम्हारी याद के साथ?

तुम्हारे बिना
इस खाली-खाली दुनिया मे
कितनी तन्हा हो जाएगी तुम्हारी याद।
* * *

October 8, 2017

बिछड़ने के बाद के नोट्स

बाद बरसों के देखते हुए 
हालांकि हमें ज्यादा कुछ याद नहीं होता। 
फिर भी लगता है कि 
उसके चेहरे पर ऐसी उदासी पहले कभी न देखी थी।
* * *

वह हमेशा उल्लास से भरी रहती। एक जगह एक ही भाव में रुकना उसका हिस्सा न था। जब हमने तय किया कि अब आगे हम एक साथ नहीं हो सकते। तब भी उसने ज़रा सी देर चुप रहने की जगह गहरी सांस ली। कुर्सी से उठी और जल्दी में कुछ खोजने लगी।

बाद बरसों के देखा कि वह टेबल पर झुकी कुछ पढ़ रही थी। वह क्या पढ़ रही थी, ये नहीं जाना जा सकता था। इतनी एकाग्रता से उसे पढ़ते हुए कभी नहीं देखा था। वह जो जेब से बाहर दिखते पेन को पसन्द न करती थी, उसी ने पेन को दांतों में दबा रखा था। उसके बाएं गाल पर बहुत ऊपर का बड़ा तिल अब और बड़ा हो गया था। उसके बाल अब भी पहले की ही तरह उलझे थे, यही एक बात नहीं बदली थी।

मैंने अपने पैरों की तरफ देखा। मैंने काले फॉर्मल शू पहने हुए थे। मैंने याद करना चाहा कि सेंडिल पहने घूमना कब बन्द कर दिया था। मैं बदल गया था। मैं बदलना नहीं चाहता था। मैं उसके लिए वैसा ही रहना चाहता था केजुअल सेंडिल, जीन्स और सफेद कमीज वाला।

इससे पहले कि वह मेरे जूते देख लेती, मैंने पीठ फेर ली। मुझे लगा कि मैंने किसी अजनबी के जूते पहन लिए हैं। उन काले फॉर्मल जूतों के साथ तेज़ क़दम मैं उससे बहुत दूर निकल आया।

हालांकि हमारे बीच का सम्बंध बहुत साल पहले से ख़त्म था।
* * *

हम एक रोज़ दोबारा कभी नहीं मिलने के लिए बिछड़ गए थे।

फिर एक सुबह नियति ने हमें एक ही वेटिंग रूम में लाकर छोड़ दिया। बैंच के किनारों पर बैठे हुए दोनों ने शायद कई बार सोचा कि उठ जाएं। मगर जाने क्या बात थी कि कोई नहीं उठ पाया।

मैंने जैसे ही बैकपैक की पट्टियों को पकड़ा, उसने आंखें बंद कर ली। वह मुझे जाते हुए नहीं देखना चाहती थी या मेरे चले जाने के लिए आंखें मूंदे थी। मैं नहीं जानता। मगर उन बन्द आंखों को देखते हुए वेटिंग रूम से बाहर आना आसान था। 
* * *

बंद रास्ते अच्छे होते हैं। हम जानते हैं कि लौट जाना है। किन्तु खुले रास्तों पर हताश मन को कभी समझ नहीं आता कि वह किधर जाए।
* * *

October 7, 2017

आस्ताने में दुबकी छाँव

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा. 

बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है. 

शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए अचानक लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. अचानक कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं. 

मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.
इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं. 

ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो. 

आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी आहट का पता कर आते हैं. चुप्पी है. आँखें मुंदने लगती हैं. कोई साया आहिस्ता से सीढियों को चढ़ता, खुली पतली बालकनी की ओर मुड़ जाता है. 

आँखें अचानक खुलकर खिड़की को एकटक देखने लगती हैं. कि वह साया दोबारा यही से गुज़रेगा. कोई नहीं गुज़रता. मन कहीं बहुत दूर किसी पुराने भव्य किले के द्वार पर जा बैठता है. बादल गुम गए हैं. दूर तक कड़ी धूप पसरी है. लम्बे दालान का फर्श गरम हो गया है. झरोखे खाली हैं. मेहराबें सूनी है. और कोई नहीं है. 

कोई नहीं. 

मन सोचता है यहाँ से उठ जाऊं. सामने सूने पड़े आस्ताने की तक चला जाऊं. वहां जाकर बैठ जाऊं. एक थकान रगों के रास्ते पूरे बदन में फैल जाती है. कि वहां बैठकर किसका इंतज़ार करना होगा. शाम कब तक आएगी. उसके बाद क्या होगा. क्यों कोई आएगा. कोई आया तो वो कौन होगा. क्या वह मेरे पास किसी खम्भे से पीठ टिकाकर बैठेगा. 

गिलहरी अब भी चुप है. नीचे देख रही है. जैसे हम अपने किसी प्रिय को बदलते हुए देखकर, हताशा में ठहर जाते हैं.

October 6, 2017

चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखें

छोटे बच्चे की तरह 
अँगुलियों पर जाने क्या गिनता रहता है मन.

उसने कहा- "किशोर सर, स्मार्ट फोन में एक एप है. जो हमारे बोलने को लिखता है और लिखे हुए को पढ़कर सुनाता है. ये कितना अच्छा है" उसकी आवाज़ में उत्साह था. प्रसन्नता भी थी. उसकी ख़ुशी सुनकर मेरी आँखें मुस्कुराने लगी. हालाँकि उसे लिखना आता था. कुछ साल पहले उससे मिला था तब उसने कागज़ पर मेरा नाम उकेर कर दिया था. अपनी अंगुली से अपने ही लिखे उस नाम को पढ़ा, किशोर चौधरी. और फिर ऐसे हामी में सर हिलाया जैसे काम सही हो गया हो.

स्टूडियो में उसने पूछा. "क्या मेरे सामने माइक्रोफोन रखा है?" मैंने कहा- "हाँ आपके सामने है." उसने कहा- "माइक्रोफोन को छूना तो अच्छा नहीं होता न?" मैंने कहा- "आप चाहें तो छू सकती हैं" उसने अपने हाथ को चेहरे की सीध में लाने के बाद सामने बढ़ाया. मुझे लगा कि वो माइक को देख पा रही हैं. इतने सधे तरीके से माइक को छूना, मुझे एक ठहराव से भरने लगा. बेहद नाज़ुकी से उसकी अँगुलियों ने माइक की जाली की बुनावट को चारों तरफ से छुआ. उसके चेहरे पर संतोष था. अचानक कहा- "तो ये है वो माइक जिससे रेडियो पर बोला जाता है"

एलईडी की रोशनी से भरे स्टूडियो की दीवारों पर लगे आवाज़ सोखने वाले परदे चुप थे. हरे रंग की मेज चुप थी. नीला कालीन चुप था. काले चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखें शायद कुछ बोल रही होंगी कि उसके होठों पर मुस्कान थी.

"किशोर सर, यहाँ बैठने के लिए और कुर्सी है तो आप बैठ जाइए. मैं आपसे सुनना चाहती हूँ, ये आल इण्डिया रेडियो है. अब हमारी सभा आरम्भ होती है." मैं हंसने लगा.

इसके बाद मैंने बहुत देर तक उससे बातें की. वे बातें पढने, लिखने और स्याही से भरी ज़िन्दगी को जीने के बारे में थी. मैंने पूछा- "आपको कैसे मालूम होता है कि दिन है या रात?" उसने कहा- "मैं तापमान से पता कर लेती हूँ. दिन और रात में हर समय का तापमान अलग होता है. मुझे उसी से पता चलता है कि सुबह होने को है या शाम ढलने को है या दोपहर में आज कितनी कड़ी धूप है"

उसने कहा- "सर आप रेडियो पर कितना अलग बोलते हैं. ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत बड़ा आदमी बोल रहा है. और आप फोन पर तो ऐसे नहीं बोलते."

मैंने कहा- " फोन पर बोलने के पैसे नहीं मिलते इसलिए..."

हम देर तक हँसे.

एक अक्टूबर की सुबह उगते सूरज की तस्वीर खींची थी. उस तस्वीर को देखकर भी उसकी याद आई. कि वह अपने घर में इस उगते हुए सूरज को महसूस कर रही होगी. हम कितने अभागे हैं कि खुली आँखों से कुछ नहीं देखते, कुछ महसूस नहीं कर पाते.

October 3, 2017

तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था

बेचैनी के पांव नहीं थे। उसके आने की आहट नहीं सुनाई दी। आहिस्ता से हर चीज़ का रंग बदलने लगा। कमरे में खालीपन भरने लगा। पेशानी में और बल पड़े कि शायद बालकनी में भी एक चुप्पी आ बैठी होगी। तुम एक लकीर की तरह होते तो भी मिटाया न जा सकता था। कि तुम्हारे होने को अंगुलियां किस तरह छूती।

कोरे मन पर एक स्याह लकीर को छूना सबसे अधिक डरावना लगता है।

न इंतज़ार, न कोई आमद का ख़याल कि सब कुछ ठहरा हुआ। दुख भी कुछ नहीं। बस एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। छू लो तो जाने किस जानिब चल पड़े, यही सोच कर अंगुलियां आपस में बांध ली।

आवाज़ के नन्हे टुकड़े फेंकती एक चिड़िया के फुर्र से उड़ जाने के बाद गिलहरी की लंबी ट्वीट से सन्नाटा टूट गया। एक सिहरन सब चीजों पर उतर गई। दोपहर का एक बजा होगा। शायद एक।

ये किस मौसम की दोपहर है। हल्की धूप है। कमरे में सर्द सीली गन्ध है। गुनगुनी छुअन वक़्त में कहीं नीचे दब गई है। अपने घुटने पेट की तरफ मोड़ते हुए लगता है कि मेरा होना थोड़ा और सिमट गया है।

कि अब खालीपन कम-कम छुएगा।

खिड़की से दिखते पहाड़ पर सब्ज़ा उग आया है। काश ऐसे ही इस अकेलेपन को भेदते हुए किसी आवाज़ के बूटे उग आएं। बेजान मन दो कदम दरवाज़े तक जाकर जूते देखने लगा। उनका रंग उड़ गया है या बारीक गर्द ने ढक लिया है।

थप-थप...

हवा में कोई बेचैनी फिर से उड़ी। सांस न लेने के लिए ख़ुद को रोक लिया। एक पत्थर की तरह कुछ पल खड़े रहकर जूते नीचे रख दिए। वाशरूम की दीवारों पर पीलापन पसर रहा है। सर पर गिरता पानी खालीपन को भर रहा है।

अचानक। घुटन के फंदे से बाहर आने को हाथ शॉवर को बंद करने के लिए दीवार को बेतरह छूते हैं। बिना हलचल की छटपटाहट पीछे की दीवार की ओर धकेल देती है। एक लंबी और डरावनी सांस आती है। दिल की धड़कन लम्बी सांस के सबसे ऊंचे शिखर पर अटक जाती है। शॉवर से पानी गिर रहा है।

मुझे तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था।

कभी नहीं।
* * *

कहानियां कहना अच्छा होता है कि बहुत सी बातों को हम कहानी कहकर छिपा लेते हैं। देर तक किसी के सामने मुस्कुरा सकते हैं। उसी खालीपन में लौट जाने से पहले।

[Painting image courtesy : James McNill Whistler]

September 20, 2017

सर्द मौसम भला था

"ऐसे दूर हो। जैसे किसी और के पास हो।" इतना कहकर हमें चुप हो जाना चाहिए. इसे अधिक कोई क्या कह सकता है. जिस हगाह नज़र धुंधला जाये, जिस जगह पहाड़ शुरू होने लगे, जिस जगह गीलापन सूखने लगे. ऐसी हर जगह पर ठहर जाना चाहिए. बहुत गहरे विचार से पूरा समय लेकर तय करना चाहिए कि हमें अब किधर जाना चाहिए. 

सर्द दिनों में पहाड़
कोहरे से ढक जाते हैं।

सर्द दिनों में भीग जाती है
रेगिस्तान की रेत।

सर्द दिनों में समन्दर
हो जाते हैं बर्फ।

मेरा जाने क्या होगा?

कि जाने किससे हो जाये
तुमको प्रेम।
* * *

पिछली सर्दियों में तुमने बुनी थी
कहवा के प्याले के लिए स्वेटर।

इस बार के सर्द दिनों में
शायद तुम सिर्फ देख ही लो कभी, मेरी तरफ।

सर्द दिनों का केवल इसलिए इंतज़ार है।
* * *

सर्द दिनों में
कोई ध्यान नहीं देता
कि दरवाज़ा बन्द क्यों है?

इसलिये अच्छा है ये मौसम।

इसलिए भी अच्छा है
कि हम छुपा सकते हैं मुंह
और कोई नहीं पूछता
वो जो बेक़रारी थी,
वो जो इंतज़ार था कहाँ गया?
* * *

सर्द मौसम भला था
कि उन दिनों मिले थे हम।

अब भी भला होगा
कि ढके जा सकेंगे, पुराने हो चुके रिश्ते
सर्दी के नाम पर।
* * *

अक्सर ज़रूरी सवालों को समय की धूल ढक देती है। अक्सर हम भी तब तक उन सवालों को एक तरफ रखा मान लेते हैं।
* * *

September 13, 2017

किमाम लगी सिगरेट

किताबें धुएं से भरी रहती। आंगन पर राख बिखरी रहती।

आलों में और चारपाई पर सड़े हुए गले की तस्वीर के साथ केंसर की चेतावनी छपे खाली-भरे पैकेट पड़े रहते। तंबाकू की बासी गन्ध हर दीवार से चिपकी रहती और खिड़कियों के रास्ते रिसती जाती। मुंह का कसैले स्वाद से पुराना परिचय था। मगर एक लकीर के आगे धुआं असर खो देता। केवल तलब बची रह जाती है। जैसे सांकल में खुद अपना पैर रखा है और घसीट रहे हैं।

जैसे दसों दिशाओं से प्रेम में लिपटे रहने पर भी सुकून नहीं आता। बार-बार चाहना से भीगे कोड़े को अपनी पीठ पर फटकारने से आवाज़ तो आती मगर क़रार न आता। ऊब बढ़ती जाती। प्रेम किये दुःख होय की चेतावनी भूलकर प्रेम में ही रम जाने के बाद सहसा कभी बेदिली होती ही है। बेअसर रिश्ते को ढोते हुए एक रोज़ ऊब जाते हैं। हम उसे एक तरफ रख देते हैं।

दो चार दिन में ही तम्बाकू की गंध किताबों, दीवारों और खिड़कियों को छोड़कर चली जाती है। ऐसे ही किसी और से चाहा प्रेम भी एक रोज़ चला जाता है। हम एक खुली सांस लेते हैं।

जो अपने भीतर उपजे और दूजे पर आश्रित न हो वही प्रेम रखना।

September 12, 2017

प्रेम के आगे चेक का निशान

तुमने एक बार झाँका 
और चले गए 
ये कैसा प्रेम करते थे तुम.

रात टेबल पर पांव रखे थे. लम्बी कुर्सी पर अधलेटा था. पहला पहर ही बीत रहा था मगर बदन की नाव, नींद के दरिया में उतरने लगी थी. पहले हिचकोले में आँख खुली. दूजे हिचकोले के मोह में आँखें फिर से बंद हो गयी.

प्रेम स्वप्न ही है. नींद का हो तो और अच्छा.

हवा में कलाबाज़ी खाते बजरीगर की तरह प्रेम में चौंक थी. प्रेम में बंदरों वाला मौन था. क्षण भर ध्यान भरी प्रतीक्षा सा दीखता और क्षणभर बाद असंगत नृत्य में लीन मिलता. कभी-कभी प्रेम टीस भरा बेहद छोटा गाना था. कोई परिंदा मुंडेर पर बैठकर गाता और उड़ जाता. जब कुछ न होता तब प्रेम कीकर का सफ़ेद लम्बा काँटा हो जाता था.

मैंने जो महसूस किया, वो लिखा. तुमने समझ लिया कि मैं कोई जादूगर हूँ.

वे किताबें जिनसे तुमको अचानक मोहोब्बत हो जाती है, वे किताबें मेरी हसरतें न थीं. वे किसी लम्हे में बिना चाहना के उग आई थीं. उदासी, टूटन और हताशा थी. यही प्रेम भी था. किसी के साथ थे. तनहा थे. जहाँ जैसे थे, वैसा होने में ज्यादा शिकायतें न थी. प्रेम करते थे. फिर से प्रेम करने लगते थे. आते थे. रुकते थे. और चले जाते थे. इसी सब में सारी परिभाषाएं समा गयीं थी.

इसलिए बहुत बार चुप रहे. 
* * *

फेसबुक पर बहुत से नौजवान लेखन की वजह से मुझसे जुड़ते रहते हैं. उन नौजवान पाठकों ने किताबें पढ़ीं तो तात्कालिक उल्लास में किताबों के साथ अपने फोटो टाँगे. लिखी हुई बातें उद्धृत कीं. अपनी सकल प्रशंसा के साथ टैग कर दिया. इनबॉक्स किया. नम्बर माँगा. नम्बर दे दिया. बात करनी चाही. और फिर रूठ गए.

मेरे पास बहुत थोड़ा समय है. उससे भी कम मन है.

मेरे पास कोई सहायक नहीं है, जो मेरी ओर से जवाब देता रहे. किसी को प्रतीक्षा न करनी पड़े. कोई उपेक्षित महसूस न करे. मेरे पास केवल मैं हूँ. अनगढ़, ला परवाह और किसी इल्यूजन में खोया हुआ. मेरे पास कहने के लिए एक ही बात है. जब मिलेंगे तब तुमसे सटकर बैठेंगे. जैसे दो प्रेमी बैठे हों.

प्रेम के आगे चेक का निशान लगाये रखो. 
* * *

दुनिया बहुत तंगहाल है. थोड़ा सा दिल बड़ा रखो. थोड़ा सा सब्र करो.

शुक्रिया.

[तस्वीर - गूगल सर्च]

September 8, 2017

जाने किसलिए

हर बात, टीन ऐज़ का मसला नहीं है। यहां जो हासिल है, वही है। बाकी सब छोटी खुशियां हैं। जिनके बारे में पक्का कुछ पता नहीं होता। लोग फिर भी ख़्वाब सी ज़िन्दगी देखते हैं। 


एक ही रास्ते से गुज़रते हुए हम देखना बंद कर देते हैं कि आस पास क्या है. यही हाल असल में हम ज़िन्दगी के साथ भी करते हैं कि उसे जीते समय भूल जाते हैं कि ज़िन्दगी जी रहे हैं. 

रेलवे क्रोसिंग से पहले एक अंधा मोड़ पड़ता है। ड्राइवर देर तक विशल बजाता है। रेल की विशल के साथ परिंदे गोता लगाते हैं।

जब भी कहीं रुक जाना होता है किसी मज़बूरी में केवल तब ही सोचने लगता हूँ अपने बारे में  कि पल भर में आसमान स्याह होने लगता है। तारे टिमटिमाते हैं। जाने किसलिए। 

एक रोज़ पंख
मिट्टी में दबकर मिट गए,
आकाश नहीं टूटा
कभी किसी के लिए।
* * *

अब कहाँ वादे,
कहाँ मिलने का हौसला,
कहाँ ठोकरों पर ज़माना।

कभी कहीं पास हुए तो

तुमको झुककर चूम लेंगे।
* * *

ज़िन्दगी के सब दांव
हम खेल चुके हैं.

हम हैं, यही बड़ी बात है.
जब तक रहें शुक्रिया.
* * *

September 4, 2017

सब खोए होंगे ख़यालों में

पूर्व प्रेयसियां भली थीं.

उन्होंने ब्रेकअप के बाद कहा कि वो मेरे पीछे था. उसने मेरे लिए क्या कुछ न किया. मैंने आखिरकार अपना सब कुछ सौंप दिया. वह बेवफ़ा निकला. मगर उन्होंने ये कभी न कहा कि वह अपनी बीवी से उकताया हुआ था. वह उसे पसंद नहीं करता था. इसलिए ही भली थी.

पूर्व प्रेमी भले नहीं थे.


उन्होंने सबकुछ नष्ट करके भी पीछा नहीं छोड़ा. वे मौसमी घास की तरह उग आते रहे. कभी-कभी बदतमीज भी थे. कभी रोते थे और रोने के बाद भूल जाते थे कि वे अभी-अभी रो रहे थे. वे हर बार उतना ही टूट कर प्रेम करते थे. मगर हर बार प्रेम करके भूल जाते थे. इसलिए ही शायद भले नहीं थे. 
* * *

बेवजह की बात एक बार ज़ेहन में आती है तो वहीँ अटक जाती है. जब तक उसे कह न दो, वह अटकी रहती है. जैसे हम अपने प्रेम की किसी निशानी को कहीं रख देते हैं और भूल नहीं पाते.

आज की रात चाँद खिला है. छत पर रोशनी है. दूर तक कुछ न कुछ दीखता है. मैं चारपाई पर अधलेटा. दो अलग ब्रांड की व्हिस्की को पीते हुए सोचता हूँ. उन लोगों का क्या होगा? वे जो अब प्रेम करेंगे. जाने क्या होगा मगर उनके लिए कुछ बेवजह की बातें

धोखा लगातार
प्रेम की टोह में रहता है।

पहले अंदेशे में
जो भाग नहीं पाते उनको
धोखा अपनी बाहों में भर लेता है।
* * *

धोखे के पास हर रंग होता है
वह घास में घास सा
छांव में छांव सा दिखता है।

प्रेम को रंग बदलना नहीं आता
इसलिए अक्सर मारा जाता है।
* * *

धोखे की पूंछ लम्बी होती है
उसे सम्भलना होता है हर दांव में।

प्रेम की पूंछ बहुत छोटी होती है
प्रेम को दांव नहीं खेलना होता है।
* * *

धोखा देख सकता है
बेहद कम रोशनी में।

प्रेम कभी नहीं देखता, कुछ भी।
* * *

धोखा चुनता है
रास्ते और सही अवसर।

प्रेम खोया रहता है, जाने किस ख़याल में।
* * *

प्रेम का
मौसम आता है।

धोखा सदाबहार है।
* * *

हज़ार धोखे हैं।
मगर प्रेम लाख हैं।

ताकि चलता रहे कारोबार।
* * *

रात के इस वक़्त कौन प्रेमी पढ़ रहा होगा कुछ. सब खोए होंगे ख़यालों में. दुआ कि सबको प्रेम मिले.



[Picture credit : Pragati Singh]

September 1, 2017

इमोटिकॉन्स - भाषा में मोक्ष का मार्ग

कोई किस हाल में जी रहा है, ये तुम कभी भी जान और समझ नहीं सकते हो. इसलिए सबके लिए थोड़ा प्यार रखना. कुछ बोलकर किसी का भी दिल न दुखाना.
* * *

कल सुबह बारिश हो रही थी. बारिश के सुर में जीवन के आलाप को सुनते, मैं बहुत देर तक बालकनी से बादलों के बरसते हुए फाहे देखता रहा. चाय की ख़ुशबू, कहानी की किताबों के पन्ने, बाहर दूर तक फैली हरी झीनी चादर के बीच बने रास्ते सम्मोहक थे. जीवन में एक ठहरा हुआ सुकून भरा पल कितनी हीलिंग से भरा होता है? ये हम अक्सर समझ नहीं पाते हैं.

अगस्त की आखिरी शाम को जयपुर की सड़कों से भीड़ गायब थी.

जगतपुरा से विद्याधर नगर वहां से मानसरोवर होते हुए मालवीय नगर तक आते हुए देखा कि शहर किसी सुस्ती में डूबा है. शायद बारिश ने शहर की बदहवास दौड़ पर आराम का कोई फाहा रखा होगा.

मॉल्स पर भीड़ नहीं थी. मैंने आभा से कहा- "बताओ क्या उपहार लिया जाये. कल आपका जन्मदिन है" आभा ने अपनी आँखों से इशारा किया जिसका अर्थ था- "मैं बेहद ख़ुश हूँ और जीवन ने जो दिया है, वह बहुत है." क्या सचमुच एक इशारे भर से इतना कहा जा सकता है? आप इससे असहमत हो सकते हैं. लेकिन वास्तविकता ये है कि भाषा के संकेत कुछ नहीं कहते हैं. हमने ही उन संकेतों के अर्थ तय किये हैं. लेकिन चेहरे के संकेत, आँखों के इशारे और हमारे बदन की लय एक अलिखित और बेहद व्यापक अर्थों वाली भाषा है.

हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसमें संकेतों की एक नई भाषा है. ईमेल से सोशल एप तक के लम्बे सफ़र में इमोटिकॉन्स हमारे संवाद का अविभाज्य हिस्सा हो गए हैं. इमोटिकॉन्स की खोज किसने की थी? आप इसे गूगल करेंगे तो एक ठीक नाम पाएंगे स्कॉट फह्लमैन. गूगल आपको ये भी बताएगा कि इस खोज का वर्ष था, उन्नीस सौ बयासी.

अल्प विरामों और बोधक चिन्हों के मेल से किसी चेहरे के साथ अनुभूति का मिश्रण इमोटिकॉन है. इमोशन और आइकॉन से मिलकर बना ये शब्द और ये जादू अद्भुत है. मैं अपने दोस्तों, चाहने वालों और प्रसंशकों से बातचीत में बहुत बार या ज्यादातर इस तरह बात करता हूँ कि शब्द दो चार लिखता हूँ और इमोटिकॉन्स सौ-डेढ़ सौ. उनको हमेशा इस बात से तकलीफ होती है. वे कहते हैं हम बोलते रहते हैं. बक-बक करते हैं. आप केवल स्माइली बनाकर चलते बनते हैं.

मैं किसी से प्रेम करूँ तो उसके लिए प्रतिक्रिया में दिल बना दूँ. मैं अपनी तारीफ सुनकर एक लजाता चेहरा बना दूँ. ब्लश करने को आप कभी उतना अच्छा नहीं लिख सकते जितना कि ब्लश करती स्माइली से अभिव्यक्त कर पाते हैं. आप किसी अच्छी बात के लिए एक तारीफ भरा अंगूठा दिखा सकते हैं. आप किसी के बुरे व्यवहार के लिए माथे पर सलवटों से भरा लाल चेहरा बना सकते हैं.

ये सब है तो क्यों अपने आपको शब्दों में बेजा खर्च करें. आपके पास कितना समय है कि गप करते जाये. अपने काम भूलकर किसी को प्रसन्न रखने के लिए लिखें. बेमन जवाब देते जाएँ. दुनिया जितनी सिमटी है, आदमी के पास वक़्त की उतनी ही कमी हुई है. आप ग्लोबल होने की जगह ग्रामीण होकर देखिये. आप पाएंगे कि उम्र लम्बी हो गयी है. लेकिन हम ग्लोबल होने को अभिशप्त हैं. इसलिए लम्बे उबाऊ संवादों की जगह अनेक अर्थ देने वाली स्माइली मुझे ज्यादा उपयोगी लगती है.

इसे आप एक बेहद मामूली और अस्थायी कहकर बिसरा सकते हैं. लेकिन ये भाषा के भीतर उपस्थित विद्रोही हैं. इमोटिकॉन्स, अक्षरों से बनी शब्दों की भाषा को चुनौती है. हमारी संस्कृति, भाषा और संवाद पर कब्ज़ा करने की अविराम होड़ में इमोटिकोंस कम तनाव और भद्र विरोधों की नयी कल्चर को आगे बढ़ा रहे हैं.

जब भी कोई बड़ी असहमति होती है तब अगर बोला या लिखा न जाये और संकेतों से विरोध जता दिया जाये तो जीवन में एक अविश्वसनीय आसानी उग सकती है. हम अपने कहे और लिखे को लेकर लम्बे कष्ट उठाते हैं. लेकिन अक्सर संकेतों की भाषा में की गयी प्रतिक्रिया के कारण कम तकलीफ पाते हैं.

हमारी संकेतों की प्राचीन दुनिया के बीजक अभी तक पढ़े नहीं जा सके हैं. हम चाँद सितारों को जान लेने के लिए जितना काम कर रहे हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन हमारे पुरखे संकेतों की जो भाषा गुफाओं, तहखानों, पिरामिडों और ज़मीं में दबे हुए खंडहरों में छोड़ गए हैं. उसे पढने के लिए इतना काम नहीं कर सके हैं. मनुष्य वस्तुतः अपने भविष्य को लेकर जितना संवेदनशील हैं. अतीत के लिए ठीक उतना ही असंवेदन से भरा है.

हम होड़ में हैं इसलिए आगे ही देखना चाहते हैं. हम बीजकों में छिपे रहस्य भरे सूत्रों को समझने में वक़्त इसलिए नहीं गंवाना चाहते कि उस आनंद की प्राप्ति के प्रति आश्वस्त नहीं है. हम मंगल पर नया जीवन बसा पाएंगे या नहीं मगर इस सम्भव के लिए आशा रखते हैं.

इमोटिकॉन्स पर दुनिया भर में हजारों शोध किये गए हैं. ये शोध सामाजिक, व्यावहारिक और भाषा के साथ मनोविज्ञान से सरोकार रखते हैं. ये शोध अस्सी के दशक में हुए इस अविष्कार के उपयोग और फिर नब्बे के दशक में जापान में टेलीकम्युनिकेशन की भाषा में शामिल आइकॉन के प्रभाव को बहुत व्यापक बताते हैं. सबसे पहले जापान में ज्यादातर टेली ओपरेटर स्माइली की लेंग्वेज को अपडेट कर रहे थे. लोग इनका तेज़ी से उपयोग करने लगे थे. बहुत से लोग ये मानते हैं कि जापान ही स्माइली की उर्वरा भूमि है. जिसने इनको सुन्दर और प्रचलित बनाया है. वहीँ से इमोजी शब्द से हमारा परिचय हुआ है.

राकयेल एम ब्रिग्ग्स ने अपने शोध में इमोटिकॉन्स के बारे में कहा हैं- "मनुष्य के वृहद् सामाजिक इतिहास में हमारे व्यवहार विकास और सामाजिक अनुभव में इमोटिकोंस की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण और व्यापक है."

इमोटिकॉन्स के बाद ये स्माइली, पिक्चर मेसेज के अगले पायदान पर है. जापान और चीन में तीन पीढियां इनके माध्यम से संवाद कर रही है. स्पेनिश लोग तो कलात्मक रूप से इनका उपयोग कर रहे हैं. सुविधाओं के उच्च शिखर पर बैठे दुनिया के शोषक अमेरिकन भी अपने हताश जीवन में नयी आशा के लिए स्माइली, इमोटिकॉन्स, पिक्चर मेसेज पर गहरा शोध कर रहे हैं.

भारत देश को बहुत बार सौ साल पीछे होने के लिए कोसा जाता है. पाश्चात्य अविष्कारों के सर्वाधिक प्रयोगकर्ता देश के सर पीछे होने का लेबल बेजा नहीं है. हम असल में सन्यास की अवधारणा और निठल्ले होने में सुख खोजने वाले लोग हैं. दुनिया भर के स्पेस कार्यक्रम को भारत ने अंगूठा दिखा दिया है. अन्तरिक्ष में उपग्रह स्थापित करने के कारोबार को भारत अगले दस साल में अधिग्रहित कर ले तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा. असल में आश्चर्य तब होगा जब हम फिर से नदी के घाट और सूने रेगिस्तान की बावड़ी के किनारे बैठकर सोचना शुरू करेंगे. कि धरती कैसे बनी है. प्राणी क्या हैं और हम सब कहाँ जायेंगे?

ये इमोटिकॉन्स हमारी भाषा में मोक्ष का मार्ग बना रहे हैं.

साल दो हज़ार दस से दुनिया भर में प्रचलित हुई नयी भाषा के स्टीकर अद्भुत हैं. लेकिन भारत में पिक्चर मेसेज ज्यादातर उधार के हैं. हमें जिस किसी एप ने जो दिया हमने अपना लिया. हमारे अपने ओरिजनल काम में दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में हिंदी की एसो. प्रोफ़ेसर अपराजिता शर्मा बेहतरीन हैं. उनके नाम और काम से मेरा परिचय नीलिमा चौहान की किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स में किये गए इलेस्ट्रेशन से हुआ था. उसके बाद मैंने फेसबुक पर उनके बहुत सारे काम को देखा. अपराजिता का काम इसलिए अच्छा है कि वे अपनी कल्पना की कश्ती को व्योम में उतार देती हैं. जब तक वे कल्पना को ठहरने न देंगी ये काम और सुन्दर होता जायेगा. लेखन और कलाएं कल्पनाशक्ति से ही प्राण पाती हैं.

आज की सुबह मैंने आभा को व्हाट्स एप पर एक बेहद सुन्दर बधाई भेजी है. ये अपराजिता का 'सितम्बर महीने का स्वागत' है. मेरे लिए सितम्बर का पहला दिन स्वागत का ही दिन है कि इसी दिन वो लडकी दुनिया में आई जिसने मुझे अपने बराबर बनाये रखा. जो मेरी तमाम खामियों और खूबियों को सहजता से स्वीकारती रही. जिसने मुझे लिखने के लिए स्पेस दिया. जिसने प्यार किया.

हैप्पी बर्थडे आभा.

August 27, 2017

प्रेम का जाने क्या होता है

सायकिल के कॅरियर पर बैठे
उनींदे बच्चे के पांव से गिरे
कच्चे हरे नीले रंग के जूते की तरह।

अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है, प्रेम।
* * *

मैं चलते हुए अचानक रुक गया. जैसे कोई चिट्ठी जेब से गिर गयी. मुझे बहुत सालों से किसी ने चिट्ठी लिखी न थी. मैंने रेत में चारों तरफ देखा. वहां कोई चिट्ठी न थी. कोई कागज़ का टुकड़ा भी न था. एक काला मोती, सोने जैसी रेत में पड़ा था. अचानक मुझे याद आया कि उसके नाक पर बेढब तरीके से बैठा काला तिल सुन्दर दिखता है. उसके बच्चे बड़े हो गए हैं. मगर वह तिल उतना ही वहीँ ठहरा हुआ है.

मैंने कभी उससे नहीं कहा कि तुम्हारे नाक पर ये तिल कैसा लगता है. उसका वहां होना ही ठीक था. जैसे हम दोनों का एक साथ होते हुए भी एक साथ न होना ठीक था. ऐसे ही रेत में पड़ा काला मनका रेत के साथ होने पर ही सुन्दर था.

जाने क्यों प्रेम भी काले मोती की तरह रेत में सुन्दर दीखता तो है मगर बहुत जल्द खो जाता है.
* * *


छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली सी टहनी पर।

सबको
बस उतना सा प्यार चाहिए होता है।
* * *

मेरी ज़रूरतें बहुत कम है
और तुम बहुत से अधिक हो।

मेरे लिए
तुम्हारा थोड़ा सा साथ
काफी से बढ़कर होता है।
* * *

शुक्रिया कहने का सलीका
नहीं सीखा जा सका, मुझसे।

मेरे पास तुम्हारे लिए, सदा भीगे होठ रहे।
* * *

तुमसे जो भी मिला
वह चाहना से ज्यादा निकला।

मिलने की बेचैनी बहुत गहरी रही
तुमसे बिछड़कर आंसू टूटकर बहे।
* * *

ठेलों पर पड़े
पुराने कपड़ों की तरह
पुराना प्रेम
बचा रहा स्मृति के खटोले पर।
* * *

समय रुक नहीं जाता था
घड़ी के बंद हो जाने पर।

इसलिए हम चाबी भरते रहे।

रुक गए प्रेम को
आगे बढ़ाने की जुगत न मिली।
* * *

पंछी उड़कर
फिर लौट आता है घोंसले पर।

कभी अचानक
हमेशा के लिए नहीं भी आता।

प्रेम का जाने क्या होता है।
* * *

धूप में पड़ी कुर्सी
एक दिन मर गयी।

दिल मे छुपाकर रखा प्रेम भी नहीं बचा।
* * *


प्रेम नदी के बीच का सफेद भंवर न था. वह भूरे पहाड़ की स्याह उपत्यका भी न था. उसने कहा- "आप मिलने के बाद भूल जाते हो" मैंने बहुत देर तक सोचा. मैं कितना खराब आदमी हूँ. इस तरह साथ होता हूँ जैसे इसके सिवा कहीं का नहीं हूँ. फिर इस तरह चला जाता हूँ कि जैसे कुछ था ही नहीं.

कमसिन लड़कियां और लड़के कभी नहीं समझ पाते कि उनकी ज़रूरत क्या है.

मैं जो समझता हूँ, वह तुम न समझो तो अच्छा है. प्रेम-प्रेम करना बड़ा रूमानी काम है. लेकिन दोस्त मुझे सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत होती है. इतना समझ आता है. इसमें कितना प्रेम है? इस बारे में मैंने कभी सोचा नहीं.

तुम भी अगर न सोचोगे तो सुख पाओगे.
* * *

August 18, 2017

सराह एप - ओट से चलते बाण

असल में ऐप के पीछे छुपा हुआ शुभचिंतक आपकी हर तरह से हत्या का इरादा रखता है। आप समझ नहीं रहे।

मेरे पिता के ज़माने के लोग कहा करते थे कि अपनों को मुंह पर डांटते रहिये, पीठ के पीछे उनकी प्रसंशा कीजिये। एक ऐंटी सोशल एप ने बुजुर्गों की ये बात याद दिला दी है। अब चुपके से बिना नाम बताए ढेर तारीफें फेंकी जा रही हैं।

लेकिन मेरा एक डर अभी बाकी है। ये अदृश्य लोग कितने ख़तरनाक हैं। ये आपकी अच्छाइयों को आपके सामने स्वीकारते नहीं हैं। ये लोग आपके सामने प्यार और इज्ज़त से देखते नहीं लेकिन पसमंज़र में आपके लिए दिल उछाले जा रहे हैं। आपको अपना क्रश बता रहे हैं। आपको डेट पर चलने के न्योते दे रहे हैं।

किसी भी व्यक्तित्व को सम्मान और प्रेम चाहिए होता है। वह आपके मुख से अपने बारे में दो मीठी बातें सुनकर ख़ुश भी रहना चाहता है। हम ऐसा नहीं करते हैं।

एप पर आये संदेशे अगर आपने ख़ुद ख़ुदको नहीं भेजे हैं तो सावधान रहिये।

मैंने एप का उपयोग नहीं किया। अगर किया होता और कोई मुझे गुप्त तरीके से कहता कि आप अच्छी कहानियां लिखते हैं। तो ये हौसला अफ़ज़ाई क्या सचमुच होती? ऐसा क्यों है कि आप किसी को अच्छा कहने के लिए मुंह छुपाये रखना चाहते हैं। क्या किसी को सामने अच्छा कहने से आपका मुंह काला हो रहा है?

एप के पीछे छिपे लोग, आप जिन बातों के लिए डिजर्व करते हैं, उन गुणों के हत्यारे हैं।

August 16, 2017

जेएनयू परिसर की एक दोपहर


उदासी का कोई कवर नहीं होता। मगर वह धुंधली होकर मिट जाती है।

August 12, 2017

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 

पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 

दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो. 
* * *

मेरी आँखों में
मेरे होठों पर
मेरे चश्मे के आस पास
तुम्हारी याद की कतरनें होनी चाहिए थी.
लेकिन नहीं है.

ऐसा हुआ नहीं या मैंने ऐसा चाहा नहीं
जाने क्या बात है?
* * *

मैं नहीं सोचता हूँ
गुमनाम ख़त लिखने के बारे में.
मेरे पास कागज़ नहीं है
स्याही की दावत भी
एक अरसे से खाली पड़ी है.

एक दिक्कत ये भी है
कि मेरे पास एक मुकम्मल पता नहीं है.
* * *

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के
बहुत देर बाद तक नींद नहीं आई.

मैं सो सकता था
अगर
मैंने ईमान की किताबें पढ़ीं होती

मुझे किसी कुफ़्र का ख़याल आता
मैं सोचता किसी सज़ा के बारे में
और रद्द कर देता, तुम्हें याद करना.

मैं अनपढ़ तुम्हारे चेहरे को
याद में देखता रहा
न कुछ भूल सका, न सो पाया.

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के बहुत देर बाद तक.
* * *

तुमको
पहाड़ों से बहुत प्रेम था.

तुम अक्सर मेरे साथ
किसी पहाड़ पर होने का सपना देखती थी

ये सपना कभी पूरा न हो सका
कि पहले मुझे पहाड़ पसंद न थे
फिर तुमको मुझसे मुहब्बत न रही.

आज सुबह से सोच रहा हूँ
कि तुम अगर कभी मिल गयी
तो ये किस तरह कहा जाना अच्छा होगा?

कि मैं
एक पहाड़ी लड़की के प्रेम पड़ गया हूँ.

फिर अचानक डर जाता हूँ
अगर तुमको ये बात मालूम हुई
तो एक दूजे से मुंह फेरकर जाते हुए
हम ऐसे दिखेंगे
जैसे पहाड़ गिर रहा हो
रेत के धोरे बिखर रहे हों
समन्दर के भीतर कुछ दरक रहा हो.

और आखिरकार मैं पगला जाता हूँ
कि मैंने उस पहाड़ी लड़की को अभी तक कहा नहीं है
कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.

हमारे बीच बस इतनी सी बात हुई है
कि एक रोज़
वह मेरे घुटनों पर अपना सर रखकर रोना चाहती है.
* * *

मैं कितना नादान था।

हर बात को इस तरह सोचता रहा
जैसे हमको साथ रहना है, उम्रभर।

दफ़अतन आज कुछ बरस बाद
हालांकि तुम मेरे सामने खड़ी हो।

तुमको देखते हुए भी
नहीं सोच पा रहा हूँ
कि एक रोज़ तुम अपने नए प्रेमी के साथ
इस तरह रास्ते मे मिल सकती हो।

तुम पूछा करती थी
क्या हम कभी एक साथ हो सकते हैं?

मैं हंसकर कहता-
कि क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

अब सोचता हूँ
कि सचमुच क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

मैं कितना नादान था।

[Painting courtesy : Jean Haines]

इस रुत


तुरई के पीले फूलों पर
भँवरे मंडराते रहे
बेरी में घोंसला बनाती रही नन्ही काली चिड़िया
बेशरम की बेल चढ़ गई नीम की चोटी तक
मन, ख़रगोश घर के बैकयार्ड में खोया रहा।

इस रुत कहीं जाने का मन न हुआ।


August 9, 2017

और कोई प्रेम नहीं तुमको

सघन दुःख की भाषा में ठीक से केवल हिचकियाँ लगीं होती हैं.

दुःख जब घना होता है तब हम जिस भाषा में प्रखर होते हैं, उसी भाषा में अल्प विराम ( , ) अर्द्ध विराम ( ; ) पूर्ण विराम ( । ) विस्मयादिबोधक चिह्न ( ! ) प्रश्नवाचक चिह्न ( ? ) योजक चिह्न ( - ) अवतरण चिह्न या उद्धरणचिह्न ( '' '' ) लोप चिह्न (...) लगाना भूल जाते हैं.

ठीक वाक्य विन्यास और बात सरलता से समझ आये, ये तो कठिन ही होता है. 

* * *

दुःख के सामने घुटने मत टेको. दुःख को उबालो और खा-पी जाओ. 

आलू, अंडे और कॉफ़ी की एक पौराणिक कथा है. एक बेटी ने पिता से कहा- "पापा मेरे सामने असंख्य समस्याएं हैं. मैं दुखी हो गयी हूँ." पिता उसे रसोई में ले गए. तीन मर्तबानों में पानी डाला और उनको आंच पर रख दिया. एक मर्तबान में आलू डाला, दूजे में अंडा और तीसरे में कॉफ़ी. कुछ देर आंच पर रखने के बाद पिता ने कहा- "देखो, इन तीन चीज़ों के सामने एक सी विषम परिस्थिति थी. इस आंच को सहने के बाद, आलू जो कि सख्त था. वह नरम हो गया है. अंडा जो कि एक कच्चे खोल में तरल था, वह सख्त हो गया है. और कॉफ़ी ने तो पूरे पानी को ही, अपने जैसा कर लिया है."बेटी ने अपना सर हिलाया और कहा- "हाँ" पिता ने कहा- "मुश्किलें कैसी भी हों. हम उनका सामना करके क्या बनते हैं? ये महत्वपूर्ण है. हमें कॉफ़ी की तरह दुखों को ख़ुद में घोल लेना चाहिए.उन पर हावी हो जाना चाहिए" 

मैं होता तो बेटी से कहता- "तुम क्या पहले खाना पसंद करोगी? आलू या अंडा?" 

इसलिए कि ज्यादा फर्जी ज्ञान अच्छा नहीं होता. ज्ञान के नाम पर किसी को बरगलाने से अच्छा है कि तुमको जो अच्छा लगे वह पहले खा लो मगर ध्यान रखो कि कॉफ़ी ठंडी न हो जाये. वर्ना दोबारा गर्म करनी पड़ेगी. 
* * *

महाभारत में धर्म और न्याय के नाम पर जितनी मनुष्यता की क्षति हुई, उसमें तेरहवें दिन की क्षति सबसे भारी थी. हरेक युद्ध मनुष्यता की राह का रोड़ा है. लेकिन चक्रव्यूह के भीतर भी नियम तोड़ दिए जाएँ तो ये अति की पराकाष्ठा है. अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया लेकिन राजा जयद्र्थ ने पांड्वो को अंदर आने से रोक दिया था. चक्रव्यूह में अभिमन्यु ने असंख्य योद्धाओ को मार गिराया. इनमें वृह्द्व्ला, कोसल और करथा के राजा, भोजराज , शल्य पुत्र रुक्मरथ शामिल थे. इनके अलावा उसने दुर्योधन के पुत्र को भी मार दिया. दुर्योधन ने क्रोधित होकर दुशाशन के पुत्र दुर्माशन को अभिमन्यु को मारने भेजा किन्तु वो स्वयं मारा गया.

इस पर क्रोधित दुर्योधन ने अपने सभी योद्धाओ को एक साथ आक्रमण करने को कहा. अभिमन्यु अपना रथ, घोड़ा,तलवार और कवच तक खो चुका था. उस पर कई बाणों के साथ वार किया गया लेकिन अभिमन्यु अकेला, उन महारथियों पर रथ का पहिया लेकर टूट पड़ा. अपनी अंतिम सांस तक लड़कर, अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गया. 

इसी तरह हिंदी का पाठक हर असाहित्यिक युद्ध के चौथे, पांचवें या तेरहवें दिन मारा जाता है. गुरु-शिष्य, प्रवचनकर्ता-श्रोता या गडरिये-भेड़ के खोल से कांव-कांव करते पक्षी बाहर आते हैं. अपमानित स्त्री के पक्ष में अपमान करने वाले की स्त्री को नोचना चाहते हैं. बेटी को इस कीच में घसीटना चाहते हैं.
साहित्य की इस कुमति बेल ने अकूत वंश वृद्धि कर ली है. अब हर कोई किसी न किसी की ज़ुबान से गिर पड़ता है. 
* * *

प्रगतिशील. जनवादी, लोक कल्याणकारी, स्त्रीवादी होने में, देखना-सोचना-समझना भूल गए हो. प्रिये तुम अपने सारे वाद एक बार उतार कर नीचे रख दो. ये बोझ हो गए हैं. तुम कहना कुछ चाहते हो और तुम्हारे मुंह से निकल कुछ और रहा है. तुम जिसके विरोध में हो, उसी के पाले में खड़े हो. नीचे देखो. लाइन कहाँ हैं? 

और कोई प्रेम नहीं तुमको. 
* * *

अपनी समस्त खामियों के लिए क्षमा याचना करते हुए.

July 31, 2017

कभी इस तरह थाम सकोगे


टिंग टिंग टिंग ट्विंग
सेलफोन में कोई वाद्य बजता रहता है. स्क्रीन एक बार नीला होने के बाद चमकने लगता है. अंगुलियाँ फोन नहीं उठाती. आँखें टेबल पर पड़े फोन को देखती रहती है.

दोपहर की गहरी नींद ढली हुई शाम में खुलती है. रात आये ब्रश करते हुए. कई दिनों की बाकी शेव पर रेजर फिराते. कस्तूरी की गंध का आफ्टर शेव हथेली में लिए आईने में देखना. शोवर के नीचे खड़े हुए पानी की बूंदों को पीठ पर गिरते हुए महसूस करना. कुछ महीनों की गर्द से भरे काले जूतों को झाड़ कर सफ़ेद जुराबें खोजना. साल दो हज़ार ग्यारह की ख़ुशबू से भरी एक चेक वाली कमीज एनयू 87 और खाकी ट्राउजर.

ड्रेसअप होकर कहाँ जाओगे? ड्रिंक लेने?

बालकनी में खड़े यही सवाल दिल में आया था. कल रात उस वक़्त दस बजकर बारह मिनट हुए थे. 
* * *

ज़िन्दगी एक कहानी है. ये बहुत जगह स्किप होती रहती है. जीए हुए पलों की तस्वीर से बहुत से सीन गायब रहते हैं.

याद के नन्हे गुरिल्ला सिपाही हमला करके छुप जाते हैं.

अचानक चौंक कर बहुत पीछे किसी तनहा लम्हे में दूर तक फैली रेत पर बैठे हुए ख़ुद को याद आता हूँ. वह लगभग पूरे आसमान को देखने की एक रात थी. तारे थे. उतने ही साफ़ जितने किसी सूने रेगिस्तान की रात में होते हैं. किसी तरफ उफ़क के पास एक धुंधली लकीर थी. यही एक रूमानी बात थी.

कभी-कभी आप चाहते हैं कि रेत किसी नाज़ुक छुअन भरे दरिया की तरह बहने लगे. आप उसकी बाँहों में समा जाएँ.

ज़िन्दगी में अकेले जीना अच्छा होता है मगर कभी-कभी अच्छा नहीं होता. उस कभी-कभी में प्यास को पानी में फेंकते जाना और हाँफते जाना होता है. वही उस कभी-कभी की टूटन की मरम्मत होता है. 
* * *

एक सुबह उसकी बाहों में जागने पर याद न आया कि दुनिया के किस कोने में पड़े हैं.

मगर बाद बरसों के अचानक याद आता है. जब वह अपना गोल सा चेहरा गरदन के पास रख देती थी न. तब लगता था कि कोई ऊन का गोला है. जिससे रह रहकर गुनगुनी भाप सी हवा आती है.

वह जहाँ रहती थी, कस्बे की अनेक हवेलियों के बीच की एक हवेली थी. उसके सबसे ऊपरी हिस्से में अनेक कमरे थे. वह जिस कमरे में रहती थी. वही एक कमरा था. जिसमें कोई रहता था. उसका कहना था कि ये लम्बी खुली छत कितनी सुकूनदेह और कितनी डरावनी है. मैं कभी बता नहीं सकती. उसने ये भी कहा था कि जब आते हो न तभी यहाँ दो लोग होते थे.

कई-कई बार के आने में एक बार के आने पर उसने कहा था- "मुझे कभी इस तरह थाम सकोगे कि मुझे लगे तुम्हें हमेशा के लिए मेरी ज़रूरत है."

बाद सालों के हँसते हुए किसी ने गाली दी थी- कैसोनोवा. 
* * *

नशे के बारे में शायद तुम जानते नहीं हो. ये कैसी तलब होता है और इसकी ज़रूरत क्योंकर होती है.

मैं जानता हूँ. मगर इन दिनों कुछ नहीं करता. 
* * *

शायद कल की रात, कोई भीगा नशीला सिरा पकड़ना था. मगर वह बीत गयी. उम्र की घड़ी तेज़ चल रही है. कि बीती जिंदगी की दो बातें लिखने में भी दो घंटे चले जाते हैं.

दस मिनट लिखने के बाक़ी उसे याद करते हुए खो जाने के. 
* * *

July 30, 2017

तेरे वास्ते

मिरे वुजूद से शायद मिले सुराग़ तिरा
कभी मैं ख़ुद को तेरे वास्ते तलाश करूँ।
~मोहसिन नक़वी


July 14, 2017

अक्सर

दोपहर का स्वप्न 
साँझ की आहट से टूट जाता है. 

किसी फूल के कान में 
स्वप्न टांकते हुए सांझ ढल जाती है. 

रात का पहला पहर 
अभी बीत रहा होता है 
घने अंधरे में अचानक लगता है 
कि उस फूल की आँखें 
ठीक सामने चमक रही है. 

एक चौंक उतरती है. 

हाथ बढाकर देख लूँ कि वह है? 
मगर जो हाथ बढ़ा नहीं 
उसमें एक लरज़िश है.

कभी-कभी नींद के स्वप्न 
और जाग के स्वप्न के बीच के 
फासले पर धुंध उतर आती है.

July 7, 2017

जैसे दो लोगों के बीच कुछ बचा न हो.

कोई बात परेशां करती थी. बेवक्त याद आती. फिर मैं देर तक उसी में उलझा रहता था. इससे बाहर आने को ब्लोगर का ड्राफ्ट खोलता और लिखने लगता. कच्चे ड्राफ्ट जमा होते गए. जैसे किसी किशोर के मन में सम्मोहन जमा होते जाते हैं. वह नहीं जानता कि उन सबका क्या करेगा? मुझे भी नहीं मालूम था. दोस्तों ने कहा इन कहानियों की किताब बना लो. तीन साल लगातार तीन किताबें आ गयीं.

एक रोज़ लगा किसलिए?

अपने बचे पड़े ड्राफ्ट्स को नहीं देखा. कम-कम पढता था, ज्यादा-ज्यादा सोचता था. फ़ितरतन फिर नए ड्राफ्ट जमा होते गए. दुखों को दूर रखने का कोई रास्ता नहीं था. इसलिए उनको लिखकर अपने पास बिठाता गया.

सबसे बड़ी तकलीफ होती है, बेमन हो जाना. तीन महीनों से लैपटॉप खोलता हूँ. जमा किये ड्राफ्ट की फ़ाइल तक जाता हूँ. फ़ाइल खुली पड़ी रहती लेकिन मैं किसी कहानी में नहीं जा पाता. ये एक उबाऊ सिलसिला बन गया. निराश होने लगता फिर हताशा आने लगती.

मेरी कहानियां कहाँ गयी? मैं सोचता कि इस तरह मेरा मन कैसे सूख सकता है? क्यों पपड़ियाँ बनकर सोचने की ज़मीन टूटने लगती है? मैं बहुत परेशान रहा. फिर सोचा कि मैंने कहानी संग्रह पूरा कर लेना सोचकर ख़ुद पर कोई दबाव बना लिया है. इसलिए कुछ काम नहीं होता. जबकि ऐसा कभी न था. मैंने कई बार तीस-चालीस दिन लगातार रोज़ दस घंटे तक लिखा है.

आज अचानक क्या हुआ?

सुबह का जागा हुआ सोचता रहा कि क्या कुछ लिख सकूंगा? लेकिन सोचना एक अलग बात होती है. दोपहर अलसाया पड़ा रहा. शाम होने से ठीक पहले मेरी आँखें चमक से भर गयी. मैं मुस्कुराने लगा. सबसे पास मानू मिली तो उसे कहा- "एक कहानी सुनो."

कई बार हम कुछ नहीं कर सकते. लोग बहुत बातें करते हैं कि हर परिस्थिति से लड़ना चाहिए. हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. अथक प्रयत्न करने चाहिए. लेकिन मैं जानता हूँ कि जब आप कहीं चारों तरफ से घिर जाते हैं. तब आपके सब यत्न लगातार आपको निराश करते हैं. आपकी उर्जा चुकती जाती है. एक पल आता है जब आप गिव अप के मोड में आ जाते हैं. और ये कोई बुरी बात नहीं.

सुबह तक लगता था कि मेरे और कहानी के बीच सब खत्म हो चुका है. लेकिन ऐसा नहीं था.

July 5, 2017

मैं क्या कहता उसको?



तुम ख़ुशी की तलाश में 
एक खंडहर के सामने खड़े हो. 

हालाँकि मुझे तुम्हारे लिए ख़ुशी है. कि एक रोज़ तुम बीती ज़िंदगी को जानोगे. गुज़रे वक़्त के निशान पढना सीखोगे. समझोगे कि परमानन्द किसी साबुत चीज़ में नहीं है.

बीज का परमानन्द मिट्टी, पानी और हवा के साथ मिलकर फूट जाने में हैं. शाखों का परमानन्द हरा रंग छोड़कर भूरे हो जाने में हैं. एक बेहद बूढ़े पेड़ का परमानन्द आँख मूंदकर ठूंठ हो जाने में है. इसी तरह हर एक जो ज़िन्दा है. उसका परमानन्द अपनी गति को पा जाने में है.

प्रेम की भव्यता अधूरे होने में है और परमानंद नष्ट होकर बिखर जाने में. 
* * *

मैंने कहा- "अब जो भी लिखता हूँ बड़ा सतही और ग़ैर ज़रूरी सा लगता है." उस लड़की ने बहुत दिनों से रफ ड्राइव न किया था. सिगरेट बहुत रोज़ पीछे कभी पी थी. व्हिस्की के बारे में उसने कुछ बताया था मगर मुझे याद न रहा. उसने मेरी इस बात पर कहा- "केसी शराब को मेच्योर होने में वक़्त लगता है. आपने जो कुछ सात-आठ साल पहले लिखा है. वह आपको पसंद है. लेकिन यकीन जानो कि आज जो लिख रहे हो. वह सात आठ साल बाद वैसा ही अच्छा लगने लगेगा."

शाम की हवा गुम थी.

शायद बरसातें होने लगें. मैं आसमान में बादलों के फाहों को देखने लगा. उसकी आवाज़ फिर से आई- "मैं शायद उससे बात करना छोड़ दूँ" मैंने पूछा- "क्यों?" उसने कहा- "अब बार-बार प्रेम में पड़ने की हिम्मत नहीं रही. वही करीब होने का सोचना, मेल्स लिखते जाना, घबराये हुए रहना, सब कामों को भूल जाना. ये सब अब न हो पायेगा." मैंने कहा- "तुम भी थक जाओगी तो.." वह बोली- "तो.." जरा सा चुप रहा और फिर धीरे से कहा- "कुछ नहीं. अच्छा सुनो. क्या तुम्हें इस बात का एतबार होगा कि मैंने अपना एक बेकार सा सपना लिखकर एक लड़की को भेज दिया."

छत तक गली में हंस रहे बच्चों की आवाज़ आई.

मैंने नीचे झांककर देखा. वे दोनों बच्चे हंसी के जाल में फंस गए थे. एक दूजे को देखते और हंसने लगते. एक बूढ़ा आदमी इस हंसी से बेख़बर चारपाई पर बैठा था.

उसने पूछा- "फिर क्या जवाब आया?"

मैं क्या कहता उसको? 
* * *

सपनों के बारे में मुझे बस इतना पता है कि वे उसे बाँहों में भर लेने जैसे होते हैं. जिनके बारे में ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता कि ये सब क्या है? ठीक-ठीक किसी को कहा नहीं जा सकता कि क्या होगा. 
* * *

वह जो तुम्हारे पास इक ठहरी हुई निगाह थी न. वह अच्छी थी, केसी. 
* * *

July 4, 2017

धुएं के नीम नशे में स्वप्न


ये एक सामान्य दोपहर थी. उमस कम थी. एक सिगार के पैकेट में पड़े हुए कुछ सिगार बहुत पुराने हो चुके थे. क्या उनका स्वाद अब भी वैसा ही है. जबकि तम्बाकू पर बंधे हुए पत्ते में दरारें आ गयीं थी. बीस एक सिगारों में निचले वाली परत से उल्फत ने एक साबुत दीखता हुआ सिगार निकाला.- "लीजिये इसे ट्राय कीजिये." वह सिगार घुमाकर देखने से साबुत दिख रहा था. उसकी ख़ुशबू अभी तक काफ़ी बाकी थी. 

शहर के स्टेशन रोड पर हलके बादलों की छाँव कभी कभी शामियाना तान रही थी. बाज़ार में लोग कम थे. शादियों का आखिरी सावा निकल चुका था. निम्बू वाले गायब थे. बारिशो में पिलपिले हुए आमों से ठेला भरे हुए खड़ा आदमी ख़ुद बेहद गंदा था. उसे देखते सिगार के धुंएँ को खींचने के यत्न करते हुए पाया कि सिगरेट से इसका स्वाद अलग है. जीभ पर एक नीम कड़वाहट उतर आई है मगर गला अभी धुएं की खरोंच से बचा हुआ है. 

घर आया तो दोपहर अलसाने लगी. आँखों में नींद ने अपने पाँव पसार लिए. 

और स्वप्न की आहट हुई. 

विदेश में कहीं किसी काउंटी का क्लब था. जैसे हमारे बगीचे होते हैं. एक लम्बा रास्ता. उसके पास लोहे की फेंसिंग में हेजिंग के लिए खड़ी हरी झाड़ियों की कतार. आगे जाकर एक चौकोर बड़ा भवन जिसके नादर अलग अलग कमरे होंगे ऐसा आभास था. उसी हाल के बायीं तरफ बास्केटबाल का कोर्ट था. मैंने डॉक् हार सीढियाँ चढ़कर बायीं तरफ मुड़ते समय देखा कि वहां चार पांच लोग हैं. उनमें एक नौजवान था. एक अधेड़ उम्र का कपल था. बाकी दो लड़के थे. उनके बारे में ठीक से नहीं मालूम मगर वे कुल पांच लोग थे. 

औरत धीरे से बास्केटबाल कोर्ट की तरफ बढ़ी. मैंने देखा कि वह हवा में उछली. उसने कलाबाज़ी खाते हुए बास्केट रिंग की तरफ छलांग लगाई थी. ,उझे आश्चर्य हुआ कि वह इतना ऊँचा कैसे कूद सकती है. वह असल में बास्केट करने वाले खिलाडी की तरह कूदी ज़रूर थी लेकिन वह रिंग के ऊपर जाकर बैठ गयी.

एक छोटा सा गेप आया. जैसे अँधेरा फैल गया हो. 

वे चार लोग कहीं जा रहे थे. औरत बास्केट बाल बोर्ड के बराबर ऊँचाई पर लोहे के सपोर्ट पर बैठी थी. मैं उसकी तरफ बढ़ा. उस सपोर्ट तक पहुँचने से पहले मैंने देखा कि औरत में रुमान भर आया है. औरत बैठी थी. उसने पाने पाँव लम्बे किये हुए थे. वह मुझे पास न आने के संकेत की तरह ख़ुद को मुझसे दूर कर रही थी. असल में वह दूसरी तरफ झुक गयी थी. मैंने इसको नज़र अंदाज़ किया. मैं उसके करीब पहुंचा. एक छुअन को दो तीन बार दोहराया.  मैंने अपना सर उसकी दायीं जांघ पर रख दिया. आँखें बंद कर ली. 

अचानक औरत उन चार लोगों के साथ उसी रास्ते वापस जाती हुई दिखी. जिस रास्ते से मैं इस क्लब में आया था. औरत उनसे कह रही थी कि मैं इस बात की शिकायत करुँगी. मुझे लगा कि वह अपने पार्टनर के बारे में कह रही है. औरत और वे लोग बाहर चले गए तब वह नौजवान अचानक मेरे पास से गुज़रा. उसने मुझे कहा- "आपने ये क्या किया?"

नौजवान इतना कहकर खो गया. औरत का पार्टनर उस बड़ी बिल्डिंग के एक रास्ते पश्चिम की और जाता दिखाई दिया. उसकी बायीं जेब से एक लम्बी पिस्तौल झांक रही थी. उसका रंग चमकीला था. जैसे वह चाँदी से बनी है. वह आदमी अचानक पलटा. इसके पलटने के साथ मुझे ये अहसास हुआ कि वह मुझे खोज रहा है. शायद वह गोली चलाएगा. मैं दीवार के एक तरफ छिप गया. 

सहसा लगा कि वह आदमी मुझे खोजते हुए लुका छिपी की तरह दीवार के सहारे चलता हुआ मुझे देख लेना चाहता है. मैं गिव अप के हाल में पहुंच गया था. मैंने सोचा कि इस आदमी के साथ इस खेल में हार जाऊँगा. 

इसी भय में स्वप्न टूट गया.
* * *

दिन इतने तनहा है कि किसी आवाज़ में कोई रुमान नहीं आता. असल में मुझ तक मेरी या किसी की आवाज़ ही नहीं आती. 

June 30, 2017

चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.

सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.

इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.

बाड़मेर के महाबार गाँव में तीन औरतों के साथ एक साथ ऐसा हुआ. ये समाचार शहर और जिले भर में तुरंत फैल गया. इसे कुछ समाचार चैनल के संवाददाताओं ने आगे राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. समाचार ने एक भय मिश्रित कौतुक जगाया लोग अस्पताल की ओर भागे. उपचार के लिए भर्ती की गयी इन पीड़ित महिलाओं को देखने पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और जन प्रतिनिधि पहुंचे.

चुड़ैल की शिकार सभी महिलायें गहरे सदमें में थी. सदमें की वजह चोटी काटने के बाद आने वाला संकट था. ज़ुबानी, सोशल और अन्य माध्यमों में ये प्रचारित है कि जिस महिला के साथ इस तरह का हादसा पेश आता है, उसकी तीसरे रोज़ मौत हो जाती है.

परसों रात कोई एक बजा होगा कि लोहे के चद्दर से बने दरवाज़ा पीटने के शोर और लाठियों के ज़मीन पर पटकने के शोरगुल से आँख खुली. मैं किसी बुरे स्वप्न में था. शोर सुनकर मैं तेज़ी से चारपाई से उठा. नींद में ही तेज़ कदम रेलिंग के उस छोर पर पहुँच गया, जिस तरफ से आवाज़ें आ रही थी. मोहल्ले भर के लोग जाग गए थे. ज्यादातर छतों पर ही सो रहे थे बाकी छत पर चले आये. शोरगुल पांच सात मिनट चला और उसके बाद लोगों के ऊँचे स्वर में बतियाने की आवाजें आने लगी. कहीं-कहीं आवाज़ में हलकी हंसी के साथ थोड़ा उपहास भी था.

मैं चौंका की इस तरह नींद में रेलिंग तक चले आना खतरनाक था. मुझे हड़बड़ी में जागते ही ऐसा न करना चाहिए था. तीसरी मंजिल से अगर गिरता तो चुड़ैल मेरी चोटी काटने की जगह हाथ-पाँव तो तोड़ ही देती. या चुड़ैल को कहानियां सुनना प्रिय होता और वह एक लेखक को ख़रगोश या चूहा बनाकर अपने साथ ही ले जाती.

पड़ोस की तीसरी गली में शोरगुल थम गया था. छतों पर खड़े लोग सामान्य हो रहे थे. मैं वापस चारपाई पर लेट गया. चुड़ैल की वापसी हो चुकी थी. मोहल्ले में घंटे भर बाद सन्नाटा छा गया था.

मुझे हलकी नींद आई और मैं भी चौंक पड़ा. अपना सर ऊपर किया और देखने लगा कि छत पर कोई है तो नहीं. सीढियों के पीछे कोई छुपा तो नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं कि चुड़ैल चारपाई के नीचे ही रेंग रही हो. मुझे ख़याल आया कि चुड़ैलों को शराब पीनी चाहिए या सिगरेट. इससे उनकी उपस्थिति का पता चल सकता है. एल्कोहल की महक या जलती हुई चिंगारी देख कर पहचाना जा सकता है. लेकिन जिस तरह मनुष्य समाज भले लोगों से भरा है. जो शराब और सिगरेट से दूर रहते हैं. उसी तरह संभव है कि चुड़ैल समाज भी सभ्य चुड़ैलों से भरा हों. ऐसे ख़यालों के बीच मुझे नींद आ गयी थी.

सुबह मालूम हुआ कि भूराराम के घर पर सो रही उसकी बच्ची चिल्लाते हुए जगी. उसने कहा कि चुड़ैल आ गयी है. वह मेरे बाल काटने ही वाली थी कि मेरी आँख खुल गयी. मेरे जागते ही वह कहीं छुप गयी है. परिजनों ने दरवाज़ा पीटना और शोर मचाना शुरू किया. लड़की की नींद उड़ चुकी थी. कुछ जागरूक नौजवान गली भर में डंडा बजाते हुए घूमे कि देखो चुड़ैल डरकर भाग चुकी है.

जिला अस्पताल में उपचार को आई एक महिला को डॉक्टर ने दो-चार थप्पड़ लगा दिए. डॉ साहेब जाने किस भोपे, तांत्रिक या झाड़ागर से एमबीबीएस करके आये थे. उन्होंने विधिवत अगरबत्ती जलाई और हाथ उठाया. आस पास उपस्थित लोगों ने इसका विडिओ बनाया. आज के अख़बार में ख़बर है कि उन डॉ साहेब को सेवा से निलम्बित कर दिया गया. जयपुर के बड़े भोपों ने उनको हाजरी देने अपने पास बुला लिया है.

महाबार मेरा प्रिय गाँव है. लेकिन बाड़मेर शहर की सीमा से लगा महाबार गाँव महज एक गाँव नहीं है. ये एक अघोषित राष्ट्र है और इसका संविधान अलिखित है. यहाँ की अनूठी और विरल जीवन शैली से रोचक तथ्य सामने आते रहते हैं. कभी महाबार से कच्ची शराब की आपूर्ति हुआ करती थी. कभी चोरी गए माल को महाबार और आगे के गांवों के धोरों से बरामद किया जाता था. कभी सिलसिले से लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त होते थे. कभी संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को महाबार के धोरों पर जमूरे इक्कठे हुआ करते थे. सरकारी लवाजमा आता. बेरिकेडिंग होती. शहर भर के लोग आते. नाच गाना होता. कभी मुम्बैया सिने संसार के गवैये आते.

मुझे कोई आश्चर्य न हुआ कि बाड़मेर में चुड़ैल का प्रकोप इस गाँव से शुरू हुआ. गाँव में चर्चा थी कि सत्तर-अस्सी साधुओं का एक दल आया हुआ है. वे तीन चार लोगों के समूह में बंटकर घूमते हैं. वे इस तरह की घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है. वे भिक्षा के लिए घर घर जाते हैं. जो कोई अन्न देता है. उसका कुछ नहीं होता. जिस परिवार ने दस बीस रुपये दिए थे. उनके घरों में ही चोटी कटने की घटनाएँ हुई.

मैं जब दस बारह साल का था तब पिताजी ने लुहारों के बास में एक कच्चा घर बनाया था. वह घर लुहारों के घरों से ज्यादा विलासी दीखता था. कि उसकी छत भी थी. लुहारों के पास घास फूस की छत वाले पड़वे थे. उनके पास आग की छोटी भट्टियाँ थीं. वे खेती बाड़ी में काम आने वाले औजार बनाते थे. साथ ही घर के लिए ज़रूरी चीज़ों का निर्माण भी करते थे. ये गाडोलिया लुहार नेहरू जी के आदेश से बसाए गए थे. इसलिए मोहल्ले का नाम नेहरू नगर रखा गया था.

एक दोपहर हल्ला हुआ कि आग लग गयी है. मैं भी भागा. मैंने देखा कि पड़ोस के एक झोंपड़े में आग लगी है. आग घास फूस की छत वाली चोटी में लगी थी. उसे तुरंत बुझा दिया गया. इसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा कि हर दिन किसी न किसी झोंपड़े में आग लगती. इस आग से लपटें उठती. इसे तुरंत काबू कर लिया जाता. किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती. इस जादुई आग के पीछे कहा जाने लगा कि एक लुहारण किसान बोर्डिंग के आगे सामान बेच रही थी. वहां कोई साधू चिमटा खरीदने आया. ग्राहक और दुकानदार के बीच अप्रिय संवाद हुआ. दुकानदार को साधू ने श्राप दिया कि जिस तरह तुमको तपना पड़ता है उसी तरह अब जलते भी रहना. आखिरकार इस श्राप से बाहर आने को बाबा रामदेव से विनती की गयी. उनकी कृपा से आग लगनी बंद हो गयी. बाबा रामदेव ने साधू के श्राप को डीएक्टिवेट कर दिया. उनके इस उपकार के बदले एक मन्दिर का निर्माण किया गया. बाबा रामदेव के ये मंदिर अब भी मोहल्ले में उपस्थित है लेकिन एक निजी संपत्ति हो गया है.

कुछ साल बाद मैंने सुना कि कोई प्रेतात्मा आ गयी है. वह क़स्बों में लोगों के घरों के बाहर दरवाज़े पर लाल स्याही की चौकड़ी बनाकर चली जाती है. जिस घर के दरवाज़े पर चौकड़ी बनती है. उसके किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है. लोग भय से भर गए थे. वे चौकड़ियाँ किसने बनायीं और बाद में उनका क्या हुआ याद नहीं. मगर अब सोचता हूँ. जिस तरह ये चोटी काटने वाली घटनाएँ याद के किसी कोने में दब जाएँगी वैसा ही कुछ उनके साथ भी हुआ होगा.

आपने मॉस साय्कोजेनिक इलनेस के बारे में सुना है? इसे समाज की सामूहिक बीमारी भी कहा जाता है. ये बहुत जटिल है. इसके अनेक रूप हो सकते हैं. इसके फैलने की गति अविश्वसनीय हो सकती है. किसी समूह या स्थान के लोग एक साथ इस बीमारी की चपेट में आते हैं. हम हर तरह की छानबीन करते हैं. तथ्य जुटाते हैं. जो कुछ भी जाना जा सकता है हम जानते हैं. लेकिन फिर भी हम कोई ठीक-ठीक कारण नहीं जान पाते हैं. हमको पहली नज़र में लगता है कि मरीजों द्वारा की जाने वाली हरकतें लगभग एक सी हैं. उनके ख़ुद के द्वारा किया जाना संभव है. किन्तु तर्क और सबूतों से आगे इन बीमारों की बढती तादाद हमको भ्रमित करने लगती है. हम तुरंत अपने ज्ञान को एक तरफ रखकर अलौकिक शक्तियों के संसार की बातों की तरफ अपना ध्यान लगा देते हैं.

इंग्लेंड के मनोविज्ञानी साइमन वेस्सेली कहते हैं कि सामूहिक उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है. हम अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगते हैं. ये सामूहिक उद्विग्नता किसी भी क्षेत्र, उम्र के लोगों में आ सकती है. नाचते हुए कपड़े उतार देना. नाचते हुए हंसना. भीड़ में कोई डरावना दृश्य बनाना, करतब करना.

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में नाचना एक मेनिया हो गया था.

युवा से अधेड़ होने की उम्र की ओर बढती औरतें इस सामाजिक हिस्टीरिया का सर्वाधिक शिकार होती हैं. अपने बाल खोल लेना. कपड़े फेंक देना. हुमक हुमक कर बेतहाशा नाचना. लगातार चिल्लाना. राग निकाल कर रुदन करना. लगातार गोल गोल झूमते जाना. ऐसी क्रियाएं अनवरत दुनिया के हर कोने में होती हैं. ज्यादातर ऐसा करने वाली औरतें होती हैं. कहीं कहीं पुरुष भी ऐसा करते हैं. वे गालियाँ देते हैं. अलग मोटी, भारी या बारीक आवाजें निकालते हैं. धमकियाँ देते हैं. हमला करने पर उतारू हो जाते हैं. ये व्यक्तिगत हिस्टीरिया है. यही बातें सिलसिले से अनेक घरों में होने लगे तो इसे मॉस हिस्टीरिया कहा जाता है.

असल में हमारा अकेलापन, असंतोष, बेचैनी और घुटन इन क्रियाओं के मूल में है.

रेगिस्तान में ही नहीं वरन हर जगह औरतों के पास अपना कुछ नहीं है. वे किसी एक पुरुष के अधीन हैं. ऐसा पुरुष जो उसे अपनी प्रोपर्टी के रूप में देखता, समझता और परोटता है. दूसरे पुरुष इसी समझ के पहरेदार बने रहते हैं. अपना घर छोड़कर दूसरे घर में बसने वाली औरत से धीरे से सब सुख छूट जाते हैं. वह एक ऐसे परिवार के सुखों का कन्धा बनती है, जिनमें उसका योगदान शून्य गिना जाता है. घर की चारदीवारी में क़ैद जीवन. चौबीस घंटे की नौकरी. झिड़की, पहरे और उलाहनों से भरे दिन रात. ऐसे में जीवन कितना कठिन हो जाता है ये समझना उस आदमी के बस की बात नहीं है. जो आदमी औरत का मालिक कहा जाता है.

मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी नहीं हूँ. मुझे जादू भी नहीं आता है. लेकिन इतना ज़रूर लगता है कि ऐसे में सोशल हिस्टीरिया ही इकलौता सहारा है. कि हमारी तरफ भी देखो.

ओ वीर बहादुर आदमियों 
औरतों की ये कटी हुई चोटियाँ 
तुम किसी मैडल की तरह 
अपने साफे-टोपी में क्यों नहीं टांग लेते?

June 29, 2017

अपने जानने से परे

बारिश के इंतज़ार में कभी बारिश आ जाती है। हम बीज बोने के बाद नन्हे पौधे की प्रतीक्षा करते हैं। एक दिन वहीं टहनियां बन जाती हैं। हम सोचते हैं फूल खिल आएं। किसी सुबह कोई फूल खिला होता है। कभी हम सोचते हैं कि ज़िन्दगी गुज़र जाए तो अच्छा। एक रोज़ पाते हैं कि ज़िन्दगी गुज़र चुकी है। हम सचमुच जानते हैं कि क्या होना है। हम बस अपने जानने को मानना नहीं चाहते।

जीवन की दिव्य दृष्टि के समक्ष हमारा ज्ञान सबसे बड़ी बाधा है।
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June 16, 2017

वक़्त के रिसायकिल बिन में

हवा हो जाते हैं गीले बोसे
खो जाती हैं सलवटें बिस्तरों से।

गुलाबी रंगतें
मिट जाती है किसी याद के साथ।

वक़्त के रिसायकिल बिन में
गुम हो जाती है पूरी ज़िन्दगी।

मगर ऐ दोस्त !
उस दिन से पहले।

बिना इंतज़ार की कब सुबह होती है
कब मोहोब्बत की आखिरी शाम आती है।
* * *

एक बात अलसाई हुई
जाती हुई इस सांझ में।

बैठी है खिड़की में दो तरफ पांव डालकर।

तुम्हारी कसम।
* * *

दिल जला तो जल गया, जाने दो
अब होठों को जलाकर क्या होगा?

बाबू, बर्फ़ ज़रा सी ही रखना।
* * *

जाल नया था मछुआरे का
पर मछली वही पुरानी थी।

वो इश्क़ को वापस छोड़ आता था और इश्क़ उसे फिर खोज लेता था।
* * *

June 12, 2017

वही बरसों का वीराना.

मेरे पहलू में आकर के 
अभी से तुम क्या बैठोगे।
अभी तुमको कितने ही काम बाकी है
शादी है, मिन्नतें हैं, तल्खी है उदासी है।
* * *

वही इक रात का सौदा
वही बरसों का वीराना.

जो आ जाओ तो क्या है, ना ओओगे तो क्या होगा. 
* * *

अंगुलियां एक अक्षर लिखती है
और दिल दो-दो बार धड़कता है।
यही इक बात है जिस पर, अभी तक प्यार आता है।
* * *

सोचते थे कि
बड़ी कीमती शै है ज़िन्दगी।
मगर क्या पता था
कि कुछ पी लेंगे, किसी को चूम लेंगे 
और यही करते हुए मर जाएंगे।
* * *
अब तक बना लिया होता दूसरा पेग
और बालकनी धुएं से भर गई होती।
अब तक
इनबॉक्स में ये लिखकर मिटा भी दिया होता 
कि तुम्हारी याद आती है।
तुम गए तो ज़िन्दगी चलती रही मगर
एक व्हिस्की न हो तो सब काम ठहर जाते हैं।
* * *

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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