December 21, 2015

उस रोज़ आप ये भी जान लेते हैं

सर्द दिन की दोपहर में किसी की सलाइयाँ छूट गयी, जीने पर. रिश्तों जैसे जो धागे थे, वे उलझे होते तो सुलझाने के जतन में बिता देते नर्म सुबहें और ठंडी शामें मगर बदनसीबी ये कि वे धागे लगभग टूट चुके हैं. सलाइयों को देखता हूँ तो ख़याल आता है कि आँखें ऊन के गोले हुई होती तो उनमें सलाइयाँ पिरो कर रख देता किसी आले में. 


रात के बाजूबन्द से
झरती है, ठण्डी हवा।
* * *

सर्द आह थी किसी की
या मौसम का झौंका छूकर गुज़रा था।
* * *

वे सब जो
विपरीत होने का बोध थे,
असल में एक ही चीज़ थे.
* * *

भ्रम
प्रेम का सबसे बड़ा सहारा है.
* * *

अक्सर कोई कहता है
तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देते
अक्सर दिल मुस्कुराकर बढ़ जाता है आगे.

जाने क्या बदा है?
* * *

उम्मीद से अच्छा
और उम्मीद से अधिक मारक कुछ नहीं है.
* * *

फूलों के चेहरे से स्याही बुहारती,
भीगी हरी घास पर रोशनी छिड़कती, ओ सुबह!
आ तुझे बाहों में भर लूँ।
* * *

इस बियाबां के दरवाज़े हैं
और सब बंद है. यहाँ कौन आता है?
* * *

उदास किवाड़ों पर
बेचैन मौसमों की दस्तकों में
दिल के एक कोने में
जलता हुआ किसी धुन का अलाव.

और सोचें उसे, जबकि वो, अब वो नहीं है.
* * *

आँखों में कुछ फूल उकेरे हुए दीखते थे
जो असल में थे नहीं
लफ़्ज़ों में कहानियां कही हुई मालूम होती थी
जो असल में थी नहीं.
जैसे पंद्रह दिन में किसी रोज़ चाँद दिखता है
आधे से ज़रा सा ज्यादा मगर वो होता तो उतना ही है
जितना कभी था.

इसी तरह झूठ अपने ऊपर लगा लेता है
हंसी, उदासी और शिकवों का वर्क
आधे से थोड़ा सा ज्यादा थोड़ा कम मगर
असल में होता वह झूठ ही है.

दोपहरों के इंतज़ार में अक्सर सच साफ़ दिखाई देता है और रातों की स्याही में उम्मीदें ज्यादा अच्छी लगती हैं. बशर्ते आप ख़ुद को रोने से रोक लें और सोच सकें कल के बारे में.
* * *

जिस रोज़ आप जान लेते हैं कि कोई साध रहा है एक साथ दो तीन रिश्ते. उस रोज़ आप ये बात भी जान लेते हैं कि आप एक कटते हुए पेड़ के नीचे खड़े हैं. मगर आप वहां से हटने की जगह ये सोचते रहते हैं कि किस तरफ गिरेगा.
* * *

December 2, 2015

कितनी तहें हैं, और रंग कितने हैं

दिसम्बर का महीना आरम्भ हो गया है. हल्की ठंड है मगर सर्द दिन ही हैं. सुबह धूप में बैठे हुए मुझे पुलिस दरोगा ओचुमेलोव की याद आई. और उसके साथ एक ग्रे हाउंड किस्म का मरियल कुत्ता और सुनार खुकिन याद आया. चेखव की कहानी 'गिरगिट' हमें बचपन में पढ़ाई गयी थी. शिक्षा विभाग ने सोचा होगा कि ऐसी कहानियां पढ़कर बच्चे सीख लेंगे. लेकिन बच्चों ने इस कहानी को पढ़ते और समझते हुए क्या सीखा मुझे नहीं मालूम मगर मैंने जो सीखा वह साफ़ सुथरा था. 

एक- मनुष्य के स्वभाव एवं व्यवहार की जानकारी लेना
दो- कथा की विषयवस्तु को अपने अनुभवों से जोड़ना
तीन- नवीन शब्दों के अर्थ जानना और अपने शब्द भंडार में वृद्धि करना
चार- नैतिक मूल्यों में वृद्धि करना

इनके सिवा जो कुछ और बातें कहानी के बारे में बनायीं जा सकती थीं, वे छात्र को आधा अतिरिक्त अंक दिलवा सकती थी. इसमें आगे हमारे अध्यापक कहते थे कि इस तरह की कहानियां पढने से कथा कौशल में वृद्धि होती है. 

कहानी आपने पढ़ी होंगी. इस कहानी में एक कुत्ता व्यक्ति की अंगुली काट लेता है. कुत्ते की पकड़ के हंगामे के दौरान सख्त और क़ानून की हिफाज़त के लिए प्रतिबद्ध दरोगा ओचुमेलोव अपने सिपाही साथी के साथ वहां पहुँचता है. सुनार अपनी अंगुली काटे जाने का हर्जाना मांगता है. दरोगा कहता है कि वह ऐसे आवारा कुत्तों से मनुष्यों को होने वाली हानि बर्दाश्त नहीं करेगा. भीड़ से अचानक आवाज़ आती है कि ये कुत्ता तो जनरल जिगालोव का है. इसके बाद दरोगा को बारी-बारी से ठण्ड और गर्मी लगती है. वह अपना कोट उतारता और पहनता है. अंततः ये मालूम होता है कि कुत्ता जनरल के भाई का है और वे इन दिनों यहाँ आये हुए हैं. दरोगा कहता है- अरे मुझे बताया ही नहीं गया कि वे यहाँ आये हुए हैं. कब तक रुकेंगे?” 

इसके बाद सुनार को एक उपद्रवी बताकर धमका कर दफ़ा कर दिया जाता है. कुत्ते को अपनी गोदी में उठाकर दरोगा साहब चल देते हैं. 

वे इस कहानी को कक्षा में इस तरह पढ़ाते थे कि ये व्यवस्था और चाटुकारों की कहानी है. इसमें व्यवस्था का चरित्र खुलकर सामने आता है. जहाँ कहीं व्यवस्था है वहां नैतिकता होने पर ही समाज का भला हो सकता है. आह !! काश उन्होंने इस कहानी को मनोविज्ञान की तरह पढ़ाया होता. मुझे समझाते कि बेटा इस दुनिया के आदमी का कोई भरोसा नहीं है. वह अपने लाभ और हित के लिए कितने ही स्वांग कर सकता है. तुम उसके कहे शब्दों को अंतिम न मान लेना. वह बाहर से जो दीखता है असल में अंदर से वैसा नहीं है. 

पुलिस दरोगा ओचुमेलोव काश तुम आखिरी गिरगिट होते. 

इस कहानी के नाट्य रूपांतरण को दुनिया भर में बेहिसाब खेला गया है. बहुत से कलाकार इन पात्रों को अपनी आत्मा से जोड़कर निभा सके है. इसलिए कि गिरगिट होने का गुण मनुष्य के भीतर बखूबी उपस्थित है.

November 29, 2015

तलवे चाटते लोगों की स्मृति में

एक पत्थर की मूरत थी, उस पर पानी गिरता था. एक सूखा दरख्त था उसे सुबह की ओस चूमती थी. एक कंटीली बाड़ थी मगर नमी से भीगी हुई. असल में हम जिसे सजीव देह समझते हैं, वे सब मायावी है. वे छल हैं. वे जागते धोखे हैं. वे असल की शक्ल में भ्रम हैं. उनके फरेब प्रेम की शक्ल हैं मगर असल में पत्थर और पानी के मेल जैसे सम्मोहक किन्तु अनछुए हैं. वे साथ हैं मगर दूर हैं. 

अचानक याद आया कि बीते दिनों मैं ज़िन्दा था. अचानक याद आया कि कोई जैनी थे, तो अचानक याद आया कि बौद्ध भी तो थे. उन्हीं बौद्धों के महामना बुद्ध की बातों की स्मृति से भरी कुछ बेवजह की बातें. 

महाभिनिष्क्रमण
साधारण मनुष्यों के लिए नहीं है।

वृद्ध, रोगी, मृतक और परिव्राजक को
देखना और समझना
छः वर्षों की कठिन तपस्या के बाद
मार-विजय प्राप्त कर
अज्ञान के अंधकार से बाहर चल देना।

ये केवल बुद्ध का काम हो सकता है।

बाकी दलाल मन उम्र भर दलाली ही कर सकता है।
उसकी आत्मा को इसी कार्य में सुख है। यही उसकी गति है, यही उसका निर्वाण।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 1]
* * *

विचित्र संयोग ही था कि
बुद्ध का जन्म, बोधि-प्राप्ति और निर्वाण
ये तीनों घटनाएं
एक ही दिन वैशाख पूर्णिमा को हुई।

कुछ लोगों पर मगर
उम्रभर ऐसा अंधकार छाया रहा
कि वे जिनसे मिलना तक गवारा नहीं करते थे
उनके तलवे चाटते रहे।

सब पूर्णिमाएं व्यर्थ गईँ।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 2]
* * *

बुद्ध उपदेशों के संकलन
विनयपिटक और सुत्तपिटक
थेरवादियों की कल्पनों से भरे पड़े हैं।

सत्य अलोप होने को शापित है।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 3]
* * *

सुख की खोज के सूत्रों को
लिपिबद्ध करने को आयोजित
चार प्रमुख बौद्ध संगीति
दुखों के आडम्बरों में डूबकर विदा हुई।

मूल को निष्काषित कर कल्पना अधिकार कर लेती है।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 4]
* * *

सत्य एक शाखीय है,
असत्य की अनेक शाखाएं होती हैं।

बुद्धत्व
हीनयान और महायान में विभक्त हुआ
इसके बाद थेरवाद, सर्वास्तिवाद
और सौन्त्रान्तिक शाखाएं उगी।

अफ़सोस कि बुद्धत्व शायद
हो गया होगा विदा, बुद्ध के ही साथ।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 5]
* * *

चुप्पी चोरों का सहारा
विद्वानों का आभूषण
धूर्तों का हथियार है।

बुद्धत्व का इन तीनों से कोई लेना-देना नहीं है।

[सम्यक सम्बुद्ध - मतिहीन प्रबुद्ध - 6]
* * *

चार आर्यसत्यों में
पहला कहता है संसार दुःखमय है।

कभी प्रिय किसी का अस्त्र बन जाता है
कभी प्रिय आपको अस्त्र बना देता है।

दुःख या तो पहलू में बैठे हैं या फिर दिल में।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 7]
* * *

अकारण कुछ नहीं होता
कार्य-कारण की श्रृंखला लंबी है।

वह आया तो कोई कारण था
उसके जाने का भी कारण होगा
इस द्वादशाङ्ग से बाहर आओ।

दुःख पर मिट्टी डालो।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 8]
* * *

ये सम्भावना कम
और वास्तविकता अधिक है
कि आत्मपीड़ा में आसक्ति दुःखमय है।

भिक्षु, प्रव्रज्या के लिए इस अंत का सेवन न करो।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 9]
* * *

जिनका त्याग करना था
वे भौतिक चीज़ें नहीं थीं।

मगर आडम्बर बिना
धर्म और प्रेम दोनों कठिन होते हैं।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 10]
* * *

November 20, 2015

जाने क्या बात थी, उस उदासी में

विलासिता की चौंध से दूर. मन के नीम अँधेरे कोने में रखे किसी अहसास के करीब. खाली लम्हे में कभी सुनी गयी धड़कन की याद में डूबे हुए. बीत लम्हों की तस्वीरों से उड़कर आते रंगों के हल्के शालीन कोलाज में ज़िन्दगी है. बातें बेवजह कहने में ज़िन्दगी हैं. उसे बेहद प्रिय है मेरा इस तरह कहना. कहना कि ज़िन्दगी तुम बे परदा मेरे साथ चल रही हो. मैं तुम्हें रिश्तों और पाबंदियों में नहीं जीता. मैं किसी बोसे के गीलेपन में, किसी छुअन के ताप में और इंतज़ार की नीली शांत रौशनी में वैसा ही लिखता हूँ, जैसा महसूस करता हूँ. मैं ख़राब था और मैंने हमेशा चाहा कि ज़रा और खराब होते जाने कि गुंजाइश हमेशा बची रहे. मैं तनहा था और मैंने चाहा कि और तन्हा होते जाने के सबब बने रहे. मैं प्रेम में था और सोचा कि प्रेम मुझे किसी शैतान नासमझी के कोहरे में ढककर मुझे चुरा ले. 

यही चाहना, यही जीना है. 

मैंने जब कहानियां कहनी शुरू की तो दोस्तों ने कहा- "केसी, ये कहानियां किताब की शक्ल में चाहिए." मैं विज्ञान छोड़कर हिंदी साहित्य का विद्यार्थी हुआ था, मैंने ही मित्रों से कहा- “आपने ब्लॉग पर पढ़ ली न. अब क्या करना है इनका? मुझे लेखक या कवि कहानीकार कहलाने की चाह नहीं है. मैं सिर्फ ख़ुद को लिखना भर चाहता हूँ.” 

इसके तीन साल बाद मेरी कहानी की पहली किताब आई. चौराहे पर सीढ़ियाँ. मित्र सच्चे थे. उन्होंने पचास दिन में ही पहला संस्करण खरीद लिया. जाने उस उदासी और टूटन में क्या बात थी कि नए लोगों को भी खूब पसंद आई. एक अच्छे जीवन में एक ऐसा लम्हा होता है, जब लगता है कि हम ये सब क्यों कर रहे हैं? बस उन्हीं लम्हों की वे कहानियां है. जीवन में कुछ चीज़ें और हाल, बिम्बों के माध्यम से बेहतर बयान होते हैं. ये बिम्ब ही थे, जिन्होंने उधड़ी हुई ज़िन्दगी को पैबन्दों से ढक कर एक बेहतर किस्सा बना दिया. 

एक कविता की किताब आई थी. बातें बेवजह शीर्षक वाली इस किताब के चाहने वाले अलग थे. वे जो भी थे दीवानावार थे. उनको इन बातों से सम्मोहन था. खरगोश, शराब, शैतान की प्रेमिका, रेगिस्तान की गरम हवा, इंतज़ार और खालीपन के बिम्बों से कही गयी कुछ मामूली बातें ख़ास बनकर दोस्तों के दिल में बैठ गईं. ये कविता संग्रह ऑनलाइन कम ही उपलब्ध रहा. पुस्तक मेलों में दोस्त आये और खरीद ले गए. दोस्तों ने बताया कि किताब आ गयी है. कुछ एक को अभी तक न मिली. मैं अक्सर सोचता हूँ कि मायामृग जी से पूछूँ कि किताब का क्या हाल है? लेकिन बुझे मन में चाह जागती ही नहीं. ये स्थागित होता जाता है. 

अचानक एक दोस्त ने अपनी खरीदी हुई किताब में पेन्सिल से अनुवाद करना शुरू कर दिया. ये इसी बरस जून महीने की बात होगी. कुछ महीने पहले मेरे पास डाक से आया एक पार्सल रखा था. मुझे अपनी ही किताब मिली. मैंने अचरज से खोला. उसमें जो कुछ पाया, उसे देखकर क्या महसूस हुआ? उसका बयान मुमकिन नहीं है. मेरे पास शुक्रिया और तारीफें नहीं थी. इसलिए कि ये काम इन चीज़ों के लिए नहीं किया गया था. 

मैंने शैलेश भारतवासी से पूछा कि इस किताब को कहीं से छपवा सकते हैं? 

शैलेश जी ने कहा कि कुछ अंग्रेजी प्रकाशकों को भेजते हैं. मैंने कहा- “नहीं. अव्वल तो कविता कौन खरीदता है. उस पर अनुवाद की हुई कविता. तिस पर ये केसी है कौन?” इसलिए कोई ऐसा प्रकाशक जो किताब छापने में वे सवाल न करे, जो साहित्य और प्रकाशन के नाम करके सिर्फ हतोत्साहित किया जाता है. वे बस उसे ऑनलाइन उपलब्ध करवा दे. इन नीले रंग से भरी चाहनाओं, हलके नीले रंग की बरबादियों और उससे भी हलके नीले रंग की उम्मीदों के लिए हमने तय किया इसका लिमिडेट एडिशन छापते हैं. लिमिटेड एडिशन माने कम प्रतियाँ. वे लोग जो इसका प्री ऑर्डर करेंगे और बाकी सौ किताबें. मेरी किताब का पहला एडिशन एक हज़ार कॉपी का छपता है लेकिन हम इसकी दो सौ प्रतियाँ ही छापेंगे. यही सब आज तय किया. 

एक अरसे बाद लैपटॉप को इसलिए ऑन किया है कि मैं लिखने से जुड़ा कोई काम शुरू करने जा रहा हूँ. मैं शुरू करूँगा तो शायद बहुत कुछ लिखूंगा. 

कुछ एक आपके लिए 
[आंग्ल भाषा में मेरा हाथ तंग है. मैं जैसा पढ़ पाया हूँ वैसा मैंने कॉपी कर दिया है. अग्रिम मुआफ़ी.]

At last
my smile came back.

When I thought
That the sorrow of
not being with you
is only one lifelong.
* * *

There can’t be a worst sorrow than this.

That someone is kissing you right next to your neck
and you are thinking of someone else.
* * *

Hot winds pierce the leaves bodies
sparrow keep hoping on a branch
life in desert moves on. 

Resting against the wall
the devil thinks about his beloved.

Like a pulley in a dry well
a separated heart cries
and like a blade cutting wood
shines love in separation.

Nearby the sounds of marriage drums sing
Devil’s beloved, devil’s beloved, devil’s beloved.

And the devil dies in her memory.
* * *

They confiscated my dice
and ostracised me 
saying 
I am the cheapest gambler. 

On all side of my dice was your name. 
* * *  

[Painting courtesy : Molly Prince]

November 18, 2015

वादे की टूटी हुई लकीर पर

काश बालकनी में उग आती
एक बेरी.

कोई शाख झांकती खिड़की से अंदर
कोई काँटा फंस जाता स्वेटर की बाह में.

अचानक लगता कि तुम आ गए.
* * *

उलझे होते काँटों में
और पीड़ा भरी होती पोर-पोर में.

मगर काश हम होते.
* * *

आंधियां आकर उड़ा ले जाती है गर्द
इंतज़ार आकर ढक देता है गर्द से.

तुम्हारे बिना ज़िन्दगी
आसान है या मुश्किल, कहना कठिन है.
* * *

एक तड़प सी बची है
दो धडकनों के बीच.

एक ज़िन्दगी थी सो तुम्हारे साथ चली गयी.
* * *

साँझ के झुटपुटे में
आती है उडती हुई चिड़ियाँ
दौड़ते हुए खो जाते हैं खरगोश.

रात की मुंडेर पर बैठा मैं
भर लेता हूँ दो कासे.

एक मज़बूरी से दूजा इंतज़ार से.
* * *

जैकेट की जेब के अन्दर की तरफ
छुपा लेता हूँ व्हिस्की भरा गिलास.

जैसे सहेज रहा होऊं
हताशा में उदासी
नाकामी में इंतज़ार.
* * *

रेत के धोरे की किनार पर
नदी किनारे के किसी घाट की आखिरी सीढ़ी पर
पहाड़ की तलहटी के किसी पत्थर पर बैठे हुए
आँख में एक आंसू था मगर लुढ़क न सका.

ज़िन्दगी इसके सिवा तुमसे कोई शिकवा नहीं
कि वो यूं भी न मेरा था, न वो हो सकता है.
* * *

परित्यक्त किले की
दीवार से झांक रही थी दरारें.

जाने क्यों मुझे मेरा होना याद आया.
* * *

वे गिरफ़्तार थे
एक-दूजे की बाहों में
जैसे पसरी हुई हो रेत, सूने आँगन में.


वे उलझे थे, बेरी के काँटों में
किसी पुराने अख़बार की तरह.

अब जब
कई बार मैं पी लेता हूँ दो पैग
मुझे ख़ुशी होती है, कि वे थे.
* * *

तय होनी चाहिए कोई तारीख
हर बरबादी की.

ये बहुत बुरा होता है
कि 
अचानक कोई आ जाये ज़िंदगी में. 
* * *

कभी कभी
मैं कर रहा होता हूँ दस्तखत
कि अब कुछ नहीं चाहिए.

कभी-कभी
मैं स्थगित कर देता हूँ मृत्यु
कि शायद अब भी
तुम कुछ कहना चाहते हो मुझको.
* * *

आखिरी बेवजह की बात में
मैं तुम्हें करना चाहता हूँ एक मेसेज.

मगर मैं जिसके लिए हूँ
उससे किया वादा नहीं तोडूंगा.

दुआ कर कि एक आखिरी नींद आये.
* * *

सुबह दूधिया है. 
कोहरा दीवारों, छतों, मेहराबों और रास्तों को चूमता हुआ ठहर गया है. दूर खड़े पहाड़ों से एक शांति की धुन आती है. आँखों के किनारों पर सुरमेदानी से आई ठंडी ताज़ा लकीरें रखीं हैं. सलेटी रंग के टी पर सलवटें नहीं हैं. रात किस तरह सोये थे, रात कहाँ गुम थे, रात तुमने कोई करवट ही न ली या ये बात कुछ और है. कच्चे हरे बेरों से भरी है बेरी. कहीं बोर की पीली गुच्छियाँ हैं. गिलहरियों ने अपनी सुबह की दावत शुरू कर ली है. मैं अपनी हथेली को खुला रखता हूँ. इस पर ठण्ड उतर रही है. ठण्ड दिखती नहीं, महसूस होती है. जैसे कोई होता है मगर दीखता नहीं. जैसे बातें बेवजह चली आती हैं ज़िन्दगी में. जैसे एक वादे की टूटी हुई लकीर पर खड़ी होती है कोई अजनबी परछाई. जी चाहता है इस टूटन में खुद को भर दूं और वादा बचा लूं. जी होता है शैतान का आह्वान करूँ, बस जाओ हर कहीं. रहो मेरे आस पास कि मुझे कोई दुःख दुःख न लगे, प्रतीक्षा इतनी आसान हो जाये जैसे पत्थर पर बरसते रुई के फ़ाहे. एक सख्त मन हो जो न याद करे कुछ. मगर मैं इन चाहनाओं पर आमीन कहे बिना उठ जाता हूँ. मैं जाता हूँ महबूब की याद के रास्ते. आहिस्ता और थका हुआ.

[Painting : Tsuyoshi Imamura]

November 15, 2015

बड़ी तकलीफ़ की छोटी कहानियां

रात आहिस्ता सरकती रहे मगर मन और दिमाग ठहरे रहें, एक ही बात कि तुम कब तक अपने आपको सताओगे. कब तक पागलपन के झूले पर सवार रहोगे. कोई दिन आएगा? जब ज़रा सा खुद का फेवर करोगे, बिना किसी को सताए हुए. मन को कुछ समझ नहीं आता. वह बस इसी एक बात पर सहमत होता है कि फिलहाल चुप रहो कि तुम समझ चुके हो चीज़ें सरल नहीं है. इसलिए प्लीज एक बार अपना फेवर करो कि तुम वह कर चुके हो जो किसी चीज़ को टूटने से बचाने के लिए तुम्हारे लिए ज़रूरी था. वह आवाज़ तुम दे चुके हो, जिसे देना तुम्हारी ज़रूरत थी. अब तुम खुद को हर बात के लिए माफ़ कर दो. यही सब सोचते हुए कुछ एक सच्ची और तकलीफ़ भरी बातें लिखीं. आप इन्हें सच समझें या कहानी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इससे फर्क पड़ता है कि अपने आस पास के धोखों को जल्दी पहचानना सीखना. ताकि आप गहरे दुःख से तब बाहर आ सको जब आने का अवसर हो न कि तब जब आपकी ज़रूरत हो. 
* * * 

हमारे घर में चार कमरे हैं और वहां हम दो लोग रहते हैं. मुझे बहुत डर लगता है.
* * * 

जब उसने मुझे ये बात बताई कि मैं जिससे प्रेम करती हूँ वह किसी और के साथ घूम रहा है, तब मैंने उसे झिड़क दिया था. मैंने इससे बड़ी भूल कभी नहीं की. 
* * * 

मेरे कुलीग फिजिकल टीचर ने मेरा शारीरिक शोषण किया था. मैंने अठाईस साल तक अकेले जीवन जीया था. बाद में घर वालों ने जबरन मेरी शादी तय कर दी. जब मैं नए घर में गयी तो मेरे लेक्चरर पति ने मुझसे कहा- वे बारहवीं में पढने वाली एक लड़की के साथ सम्बन्ध में हैं. 
* * * 

वह नवनियुक्त आईपीएस था. मैं उसे कॉलेज के दिनों से जानती थी. मैंने उससे कहा कि मुझे सिविल सर्विस की तैयारी में मदद कर दो. वह अक्सर मदद करने आता था. मैं इस काम से उकता गयी. आखिर मैंने तय किया मैं मर जाऊं.
* * * 

एक रोज़ माँ को पिताजी ने बहुत मारा. मैंने अगली सुबह शादी के लिए हाँ कर दी. 
* * * 

वह उसके ठीक सामने कार से उतरते हुए, उसे फोन पर कह रही थी. भीड़ बहुत है, मैं पैदल चलकर आ रही हूँ. तुम कहाँ खड़े हो? 
* * * 

वह एक रात मेरे पाँव के नाखून चूमता रहा. उसने कहा कि ये रंग बहुत प्यारा है. मुझे उसी रात उसे छोड़ देना चाहिए था. 
* * * 

उसे नहाने की आदत थी. वह अक्सर वाशरूम में बहुत देर तक नहाता था. मुझे उसे कहना चाहिए था कि अब बस. 
* * * 

उस शाम जब मैं घर पहुंची तब वह सब्जी बनाने की तैयारी कर रहा था. मैं जिस टूटन से भरी घर आई थी, उसे ऐसा करते देखकर और ज्यादा टूट गयी. 
* * * 

ये उस क्रीम की गंध नहीं थी, जो हमारे घर में रखी रहती थी. 
* * * 

मैं एक डरपोक हूँ. काश उसे कभी कह सकती कि उस रात तुमने मुझे क्या कहकर बुलाया था.
* * * 

गले में स्कार्फ बांधे देखकर सहपाठी ने कहा- डू यू हैव बॉय फ्रेंड. उसने जवाब दिया- नो, आई एम मेरिड. उनके सामने एक मॉडल पीठ किये थी. वह उसकी पीठ को देखने लगी. 
* * * 

अब ये रोज़ होने लगा कि वह खाने की थाली को दूर सरका देता. बुरा सा मुंह बनाता और घर से बाहर चला जाता था. 
* * * 

क्या तुम समझ नहीं सकते कि मुझे आज ही मिसकेरेज हुआ है इस हाल में किसी पार्टी में नहीं जा सकती हूँ. उसके पति ने कहा- मैं कुछ नहीं कर सकता, ये बात तुम जानो और माँ जाने. 
* * * 

मेरे एक बच्ची नहीं होती या मेरे पास कोई नौकरी होती तो मैं नरक से बहुत पहले बाहर जा चुकी होती. 
* * * 

वह मेरा एटीएम कार्ड अपने पास रखता है. 
* * * 

मुझे मालूम है कि वह क्या कर रही है. ईश्वर उसे दंड देगा.
* * * 

उसने मेरा हाथ बदतमीजी से पकड़े रखा. वह कह रहा था- हमारी शादी होने वाली है. जब मैंने ये बात माँ को बताई तो उन्होंने कहा कि इस उम्र में ऐसा होना कोई अजीब बात नहीं है. मुझे दुख है कि माँ ने मुझसे झूठ बोला था. 
* * * 
[Painting Image : Luqman Reza Mulyono]

October 25, 2015

तुम जो मिलोगे इस बार तो



उदासी के झोंके ने 
गिरा दिया शाख से पत्ता 

ज़िंदगी को इतना भी यूनिक क्यों होना चाहिए कि जीया हुआ लम्हा बस एक ही बार के लिए हो. कुछ क्लोन होने चाहिए कि हम उसी लम्हे को फिर से जी सकें. एक याद का मौसम जब भी छू ले, उसी पल कोई दरवाज़ा बना लें. दरवाज़े के पीछे एक छुअन हो. एक लरज़िश हो. एक धड़क हो. इस तरह याद जब उदासी और नया इंतज़ार घोले, उससे पहले हम उसी लम्हे को फिर से बुला लें. 

जिस तरह गिरते हुए पत्ते ख़ुद को धरती को सौंप देते हैं, उसी तरह कभी हम ख़ुद को प्रेम को सौंप दें. प्रेम लुहार की तरह हमें लाल आंच में तपाकर बना देगा कोमल. किसी बुनकर की तरह बुन देगा एकसार. किसी राजमिस्त्री की तरह चुन देगा भव्य. 

वह जो दरवाज़े के पीछे अँगुलियों के रास्ते बदन में उतर आई लरज़िश थी. वह उसी एक पल के लिए न थी. उसका काम बस उतना सा ही न था. 

तुम जो मिलोगे इस बार तो पूछेंगे ये हवा क्या है, उदासी कैसी है और तन्हाई कब तक है? 

October 20, 2015

तेरे बाद की रह जाणा

मौसम ऐसा है कि कमरे अंदर ठंडे और बाहर गरम। प्लास्टिक के सफ़ेद छोटे कप चाय से भरे हुए। नया हारमोनियम।। जमील बाजा के बारे में कुछ और बताते हुए गुनगुनाना शुरू करते हैं। तेरे बाद की रह जाणा... मैं कहता हूँ गाते जाइए। जमील मुस्कुराते हुए स्वरपटल पर अंगुलियां रखे हुए अपनी आँखें मेरी आँखों में उलझा देते हैं। मैं डूबता जाता हूँ। सचमुच तुम्हारे बाद जीवन में क्या बचा रह जायेगा। उदासी, तन्हाई और बेकसी। आकाशवाणी के विजिटर रूम में ढोलक की हलकी थाप से सजी संगत और सिंधी-पंजाबी के मिले जुले मिसरों का मुखड़ा, गहरी टीस से भरता रहता है। 

जमील अपने कुर्ते के कॉलर ठीक कर एक लम्बे सूती अजरक प्रिंट के अंगोछे को गले में डाल कर बिना सहारा लिए आँगन पर बैठे हैं। ग़फ़ूर सोफे पर बैठे हैं। मैं अधलेटा सोफे का सहारा लिए सामने खिड़की की ग्रिल पर पाँव रखे हुए। मैं कहता हूँ ये हारमोनियम कितने का आया? ग़फ़ूर कहते हैं कल ही अट्ठारह हज़ार में लिया। मैंने पूछा कलकत्ता का है? बोले- नहीं! पंजाब की बॉडी है और सुर... मैं कहीं खो गया कि ये न सुन पाया सुर कहाँ के हैं। मेरा मन उकस रहा था कि कहूँ कोई बिछोड़ा सुना दो। ऐसा विरह गीत की आँख भर आये। 

सिगरेट का धुंआ, सुरों की गमक फिर भी आबाद खालीपन। 

वे कलाकार अपने साज़ कसते रहते हैं। थाप लगाकर देखते हैं। मैं थके कदम बाहर आ जाता हूँ। एक कमायचा बजाने वाला नहीं आया है। उसका इंतज़ार है। स्टूडियो बिल्डिंग के साये में खड़े हुए देखता हूँ बड़ी भूरी चिड़ियां अपने साथ की चिड़िया को कुछ कह रही है। जाने क्या? मुझे लगा कि वो दो ही बातें समझा रही है। पहली बात बुद्ध की- ये संसार दुखों की खान है। दूसरी बात-सन्यास सुख का पड़ोसी है। अगली चिड़िया शायद कोई शंका रखती थी तो उसने कुछ पुछा। बड़ी भूरी चिड़िया ने अपने परों को फैलाया और कहा चलो। वे मेरे पास से उड़कर नीम पर चली गयी। 

मुझे साँस नहीं आ रही। कनपटी से पसीना आ रहा है। मैं उसे बिना छुए गरदन के रास्ते नीचे उतरने देता हूँ। मालूम है क्यों? इसलिए कि मेरे दिमाग में एक सी सा झूला है। नष्टोमोह की कामना है और कुछ नहीं जाने देने का वादा भी है। मैन गेट के पास से वॉयलिन कवर पीठ पर लटकाये हुए एक आर्टिस्ट आता है। मैं स्टील के पाइप से सहारा हटाकर अंदर की ओर चल देता हूँ। साफ पानी की मशीन के पास खड़ा होकर एक पन्नी से छोटी नीली गोली निकालता हूँ और गटक जाता हूँ। दुनिया के उस पहले आदमी या औरत के नाम जो पहली बार किसी को छोड़कर गया था।

बाजे की बॉडी तो पंजाब की है पर सुर कहाँ के हैं?

September 20, 2015

ढब सब उलटे पड़े हो जहां

इंतज़ार की कोई मियाद नहीं होती.

तपते हुए दिन और रेगिस्तान पर कुछ एक हरे टप्पे से दीखते खेत पीले पड़ते जा रहे थे. कोई राह में मिलता तो कहता इस बार जमाना ख़राब. फसलें कहीं कहीं दिख रही हैं बाकि सब जगह सुनसान. वो सप्ताह भर जो पानी बरसा था जाने किस काम लगा. भीगे दिन भीगी रातें और धूप का इंतज़ार. कुछ एक दिन बाद बरसातें इस तरह गुम हुई कि गोया रेगिस्तान सदियों से सूखा ही था. कल शाम अचानक से हवा चली और ज़रा देर बाद शहर को भिगो गयी. एक बारिश सब कुछ बदल देती है. रात अँधेरी, छपरे पर गिरती पानी की बूंदों की आवाज़. कुछ एक मुरझाई हुई ककड़ी कि फांकें. उनका फीका स्वाद. और एक पुरानी व्हिस्की से भरा प्याला. कितना तो इंतज़ार था और कैसे अचानक खत्म हो गया. उसकी इतनी ही उम्र थी. रात भर बिजली गुल. हवा बंद. आसमान से छींटे. पलंग पर से भारी गद्दों को उठाकर बाहर बालकनी में डालकर लेटे हुए, भूले भटके आते हवा के झोंकों को शुक्रिया कहते हुए रात बीत गयी. 

असल नींद उस वक़्त आई जो शैतानों के सोने का समय होता है. 

स्मार्ट फोन में बेटरी के सिवा हर बात में स्मार्टनेस है. वह तुरंत दुनियावी षड्यंत्रों, जालसाजियों, धोखों, उदासियों को घेरकर लाता है और पेश कर देता है. सूचनाएं अनिर्वचनीय हैं. वे अपने असर को लीप कर जाती हैं. वे अतीत की कुदाल है तो भविष्य की आधुनिक मशीनें हैं. पल भर में आपके सुख को खोदकर रख देती हैं. कितने जतन से दिन को किसी खाली जगह में सरकाया था, कितने श्रम से शाम कमाई थी, सब बेकार. शिकवे, शिकवे और शिकवे. पेड़ अँधेरे में हिलता है. हेजिंग के नीचे कोई सरसराहट जागती है. सीढियों के पास कोई साया लहराता है.

सुबह जब आँख खुलती है तो बिजली फिर गुल. सेलफोन अपनी निद्रा में. ०.

ऑफिस चले जाओ. वहां बिजली मिलेगी. अचानक दुष्यंत कहता है पापा कोई आपसे मिलने आये. जोधपुर विश्व विद्यालय में पढने के दिनों के साथी. त्रिलोक सर. गले मिलते हैं. मैं अपनी पीठ को ज़रा सावचेत करता हूँ. और फिर हम दोपहर भर उन दिनों की, उन दिनों के लोगों की, उन दिनों के चिंतारहित जीवन की बातें करते हैं. सर बास्केटबाल की टीम लेकर आये हैं. राज्यभर से सत्रह और उन्नीस साल समूह की बालिकाएं खेलने आई हैं. मैं बंद पड़े फोन को देखता हूँ. त्रिलोक सर अपने चालू फोन को देखते हैं. साढ़े तीन बजे उनकी टीम का मैच है. चाहना के कितने रंग होते हैं. मैं अपने फोन को चालू देखना चाहता हूँ. त्रिलोक सर फोन को अवॉयड करते जाते हैं. 

दोपहर बाद एक दौड़ से दफ़्तर जाता हूँ. फोन चल पड़े मगर वहां होना क्या होता है. चुप दफ़्तर का काम करने लगता हूँ. अवकाश के दिनों में दफ़्तर का सूनापन रूमानी होता है. कोई दुआ सलाम नहीं. खिडकियों के रास्ते आता परिंदों का शोर. सड़क से गुज़रते वाहनों की आवाजें. मैं उठकर लम्बे गलियारे को पार करके बाहर आ जाता हूँ. खाली खाली मन कहता है चलो शाम छत पर गुज़ारो. एक ज़रा सुकून और एक छोटी बेख़याली में दुशु की आवाज़ आती है. पापा कोई मिलने आये. मैं देखता हूँ महेश कुमार गुप्ता खड़े हैं. कहते हैं, मैं कई दिनों से सोचता रहा कि आपसे मिल आऊँ. किसी हड़बड़ी में कहीं कुछ मिस होता रहा, आज पक्का था कि आपसे ज़रूर मिलना है. 

मैं शाम की तीसरी चाय बनाता हूँ. चाय बनाते हुए सोचता हूँ कि इस दिन का कोई ढब है? 

September 7, 2015

स्थायी दुःख से कैसलिंग


काश बहुत से हैं जैसे गिरहें जब पैर में उलझी तब गिर पड़ने की सीख को पहले उठाया होता और ख़ुद बाद में उठता. आज ढलती हुई शाम में रेल पटरी पर बने पुल से गुज़रते हुए सोच रहा था कि पुल के उपर से देखने पर नीचे का दृश्य ज्यादा समझ आता है. इसी तरह जीवन बिसात को देखा समझा होता. बीते दिनों के किसी अफ़सोस की दस्तक के साथ फिर एक काश आता है. काश उन दिनों कुछ सोचा जा सकता परिस्थिति से थोडा ऊपर उठकर.

एक गिर पड़ने का ख़याल और एक ज़रा उपर से गिरहों को देखने की समझ. थोडा सा फासला कितना कुछ बदल देता है. सुख के भेष में दुखों को आमंत्रण पत्र लिखते समय सोचा होता कि रेगिस्तान के तनहा पेड़ सूखे के स्वागत में कुछ ज्यादा रूखे और ज्यादा कंटीले हो जाते हैं तो हमने ख़ुद के लिए क्या तैयारी की है?

मगर कुछ नहीं होता. 
बेख़याली में समय की ढलान पर फिसलते हुए दिन रात, बरस के बरस लील लेते हैं. इस छीजत में उदास काले धब्बे, अनामंत्रित खरोंचें, अनगढ़ सूरत बची रह जाती है. दुःख आता है कि बीते वक़्त रिश्तों, सम्मोहनों और कामनाओं के प्रवाह में किनारा देखा होता. खो देने के भय में लुढकते खोखले ढोल से बाहर आ गए होते. सोचा होता जिस तरह पुराने दुःख बुझी हुई भट्टी की तरह ठन्डे पड़ गए हैं आगामी दुःख भी अस्त हो जायेंगे. एक ख़ामोशी की दीवार चुनी होती. एक पत्थर का पर्दा बनाया होता. एक बार खुद से कहा होता, नहीं. कहा होता जाने दो. कहा होता कि जाने देना ही सुख है.

शतरंज के खेल में राजा और हाथी के बीच, जगह की अदला-बदली वाली कैसलिंग की सुविधा की तरह काश एक पुराना दुःख नए दुखों के सामने खड़ा कर दिया होता. काश एक स्थायी दुःख के मोल को समझा जा सकता. काश किसी स्थायी दुःख से कैसलिंग कर ली होती.

September 6, 2015

नासमझी के टूटे धागों में


कुछ काम अरसे से बाकी पड़े रहते हैं. उनके होने की सूरत नहीं बनती. कई बार अनमने कदम रुकते हैं और फिर किसी दूजी राह मुड़ जाते हैं. फिर अचानक किसी दिन पल भर में सबकुछ इस तरह सध जाता है कि विश्वास नहीं होता. क्या ये कोई नियति है. घटित-अघटित, इच्छित-फलित भी किसी तरह कहीं बंधे है? क्या जीवन के अंत और उसके प्रवाह के बारे में कुछ तय है? मैं अक्सर पेश चीज़ों और हादसों और खुशियों के बारे में सोचने लगता हूँ. अब क्यों? अचानक किसलिए? और वह क्या था जो अब तक बीतता रहा. मुझे इन सवालों के जवाब नहीं सूझते. एक चींटी या मकड़ी की कहानी कई बार सुनी. बार-बार सुनी. निरंतर असफल होने के बाद नौवीं या कोई इसी तरह की गिनती के पायदान पर सफलता मिली. मैं यहाँ आकर फिर से उलझ जाता हूँ. कि पहले के जो प्रयास असफल रहे वे असफल क्यों थे और एक प्रयास क्यों सफल हुआ.

हम कब तक जी रहे हैं और हम कब न होंगे. आदेश श्रीवास्तव. अलविदा. गीता का संदेश इसी नासमझी का सन्देश है कि कर्म किये जा और फल की इच्छा मत कर. 
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हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका

मेरा पेशा ही इतना मीठा है कि कभी खुद पर रश्क़ होने लगता है. रेडियो स्टेशन के ठन्डे सीले स्टूडियोज में कहीं बैठे हुए फिल्म संगीत सुनते सुनाते जाना से बेहतर क्या हो सकता है. रात ग्यारह बजे के आस पास जब ट्रांसमिशन के पूरे होने में कुछ मिनट भर बचे हों, उस वक़्त पाकीज़ा फिल्म से गीत प्ले हो रहा हो चलते चलते यूँ ही कोई.. और फिर रेल इंजन की विशल से फिल्म संगीत सम्पन्न हो रहा हो. या लग जा गले के फिर ये हंसी रात हों न हो गीत पूरा होने से पहले उसके आखिरी में ऐ ऐ ऐ सुनते हुए समाचारों से पहले की बीप बजने लगे. ऐसे जादुई मौसमों में संगीत और संगीत की दुनिया के लोगों के नाम बोलते हुए, साजों पर उनकी कलाकारी सुनते हुए, गीतों के बोलों को गिरहों में पिरोते हुए सुनना. कितना बेशकीमती है, मैं कभी कह नहीं पाऊंगा.

ऐसे ही पहली बार जब आदेश श्रीवास्तव का नाम बोला था वह गीत था, हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका. आज सचमुच आदेश का ख़याल मुझे बेचैन कर गया है. परसों ही मैंने आदेश के स्वास्थ्य के बारे में समाचार सुना था. उसे सुनते हुए मुझे वह शानदार व्यक्तित्व का धनी याद आया जो एक ड्रमर था. कहीं किसी टीवी शो के बारे में मालूम हुआ कि आज आदेश उसके गेस्ट हैं. मैंने उसे देखने के लिए समय निकला. वे आये और आते ही उन्होंने ड्रम को चुना. शायद कुछ प्रेम कभी बिसराए नहीं जा सकते. संगीत रचनाकार के मन का प्यारा साज़ हमेशा उसे अपने पास खींच लेता है. मैं ड्रम बजने वालों को बड़े सम्मोहन से देखता आया हूँ. शायद इसलिए कि स्कूल कॉलेज के दिनों में ड्रम बजाने वाले लड़कों से सब लड़के लड़कियां खूब प्यार करते थे. लेकिन मैं संगीत का अ आ कभी न सीख पाया. स्वप्नजीवी होने का यही एक दुःख है.

मैंने शाम के ट्रांसमिशन ही किये हैं. मुझे सवेरे जागने और पांच बजे स्टूडियो पहुँचने में रूचि नहीं रही. दोपहर आलस भरी होती थी. इसलिए मैं हमेशा चाहता था कि शाम की ड्यूटी लग जाये. और फिर उदघोषणा करते जाना. फिल्म संगीत के ईपी और एलपी छांटना. शाम की सभा के फिल्म संगीत में चलत के गाने बजाने में बड़ा सुख होता है. मेरा रेडियों में आना उन्हीं दिनों हुआ था जब आदेश श्रीवास्तव संगीतकार बनकर आये थे. और मैंने लगभग तब तक लगातार उदघोषणाएं की जब उनके आखिरी दौर की फिल्म आई होगी. कुछ बरस पहले दीवार फिल्म का गीत चलिए वे चलिए.. मुझे इस तरह अपने सम्मोहन में बांध चुका था कि फिल्म संगीत चुनते हुए हर दूसरे तीसरे दिन में उसे प्ले कर देता था. आदेश की बीट्स के साथ मेरा चेहरा अक्सर ख़ुशी से भरा हुआ हिलता रहता था. स्टूडियो के उस तरफ बैठा कोई इंजिनियर साथी जब मुझे इस तरह मुस्कुराते हुए खुश देखता तो वह भी प्रसन्न हो जाता था. ये आदेश श्रीवास्तव का जादू है जो देश और देश के बाहर और जाने कहा-कहाँ कितने लोगों को स्पंदित करता है और करता रहेगा.

इस बीच राजनीति फिल्म में आदेश का संगीत आया,. कहाँ वे रुमाल और सोणा सोणा जैसे गीत और कहाँ मोरा पिया मोसे बोलत... ये ही जीवन सफ़र है और यही सीखना है. आदेश का संगीत भी एक गहराई में अपना घर कर चुका था. अनुभूतियों से जब थोथी चीज़ें उड़ने लगती हैं, उसी समय जीवन बीज अपने सबसे लघुतम और सर्वाधिक उपयोगी रूप में हमारे सामने आता है. एक ड्रमर संगीत के अपने सफ़र में कैसी अद्भुत मिठास तक पहुँचता है यही कहानी आदेश श्रीवास्तव की याद है.

आदेश श्रीवास्तव, आप मेरे लिए स्पन्दन हैं और हमेशा रहेंगे. यकीनन मोरा पिया मैं कभी प्ले न करना चाहूँगा... आखिर रोने का भीगा गीला सीला मौसम कौन जान बूझकर अपनी झोली में भरे. लव यू.

August 23, 2015

सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना- 2

मेरे पास दो रास्ते नहीं है. मेरे पास दो मन नहीं है. मेरे पास दो कुछ नहीं है. मैं रूई का फाहा हूँ. जब तक डाल से बंधा हूँ, डाल का हूँ. जब हवा से मिलूँगा तो उसका हो जाऊँगा. मैं पहले कहाँ था, मैं अब कहाँ हूँ और मैं कल कहाँ होऊंगा, इसकी स्मृति और भविष्य कुछ नहीं है. मैं जब शाख पर खिल रहा था, प्रेम में था. मैं जब हवा से मिला प्रेम में रहा. मैं जब धूल में मिलूँगा तब प्रेम में होऊंगा. मेरा उदय और मेरा अस्त होना एक ही क्रिया की भिन्न अवस्थाएं हैं. 

मैं सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़ में एक कोमल धुन. जो इस तरह कोमल है कि फरेब भरी जान पड़ती है. पत्थरों पर पानी तभी तक पड़ा रहता है जब तक धूप का संसर्ग न हो. तुम्हारी भाषा भी कुछ विषयों पर बदल जाती है. मगर मैं जो था वह हूँ, शायद वही रहूँ. कुछ रोज़ से फिर अपनी पढ़ाई के दिन याद आ रहे थे. कुछ रोज़ से एक छूटी हुई पोस्ट याद आ रही थी. आज सुनो आगे की बात.... 
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कितने-कितनों को संदेशे भेजे
कितनों के मन की शाखों पर अपने सुख का झूला, झूला.
कितनों की बुद्धि पर झूठे नेह की कलमें रोपी.

सुनो जाना,

आवाज़ों का रेला आता
कर्म-मल गहराता जाता.

संवर के बारे में ज़रूर भगवान् महावीर ने कुछ कहा होगा. 

मानस व्यापार, नैतिक आचरण 
और कर्म क्रियाओं के बारे में कुछ सुना होगा

तुम एक पदार्थ हो, जो दूजे पदार्थ के उपभोग में लगे हो.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/24॥
* * *

तुम्हारी श्रद्धा, मित्र के आवरण में
एक जोंक की तरह है.

तुम्हारे धवल दंत
विषधर की तरह अटके हुए हैं अनेक हृदयों में
तुम्हारी जिह्वा इस दंश के सिवा, सहला रही बाकी काल्पनिक दुखों को.

सम्यक चरित्र किसे कहते हैं. वे पञ्च व्रत क्या थे?

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/25॥
* * *

उपहास के रणदे से
संबंधों की छाल को छिलते देख देखकर
कैसी अव्यक्त मुस्कान आती है न तुम्हारे चहरे पर.

निर्जरा, निर्जरा, निर्जरा.

वे जैन साधू कैसे थे
जिन्होंने दर्शन, ज्ञान और चरित्र की रगड़ से कर्म-मल को साफ़ किया.

तुम्हारी देह एक बोरा है
ज़रा एक बार भीतर झाँकों. 

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/26॥
* * *
मुमुक्षु के वरघोड़े के छद्म भेष में
मित्र बनकर तुमने जहाँ कहीं पदार्पण किया.

वहां-वहां खिले हुए उपेक्षा के पुष्प.

क्या लोकाकाश के ऊपर कोई सिद्द्शिला नहीं
भला हुआ कि तुम्हें अब तक कोई तुमसा मिला नहीं.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/27॥
* * *

तुम्हारी बौनी खिलखिलाहट नाशवान है प्रिय.

वस्तुवाद, वस्तुवाद, वस्तुवाद
अंततः हर एक की सीमा है.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/28॥
* * *




August 17, 2015

अपनी अँगुलियों से कह दो

मौसम किसी उदास परिंदे के बदन सा था. थकन से भरा और अनमना. 

विचित्र छायाओं के स्याह-सुफेद चित्र बनाते हुए बादल ठहर-ठहर कर किसी यात्रा में फिर शामिल हो जाते. हवा ख़याल से अचानक बाहर आये बच्चे की तरह टोह लेकर फिर से अपने आप में गुम हुई जाती थी. तन्हाई की स्याही से बदन के कोरेपन पर शाम लिख रही थी- कोई तुमसा नहीं होगा प्यारे. तुम अकेले ही थे. तुमने अपने असल अकेलेपन से घबराकर सम्बन्धों का चुनाव किया. ये भी हो सकता है कि वह एक चुनाव न होकर किसी हड़बड़ी में कहीं छुप जाना भर हो. घर के छज्जे के नीचे शहतीर पर बैठी नन्हीं चिड़िया की तरह ये चुनाव और बाध्यता में से कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि ये दोनों न हों. 

ज़िदगी ने जो लिखा है उसका पाठ सदा अधूरा था. अधूरा ही रहे कि जिस दिन पढ़ लिया गया उस दिन एक विस्तृत और रंगहीन दृश्य क़ैद कर लेगा. जहाँ कोई अनुभूति न होगी. जहाँ कोई आवाज़. कोई परछाई कोई भय कोई चाहना न बुन सकेगी.
***

हर किसी के जीवन में कितने ही द्वार खुले हैं. कितनी ही चीज़ों का आकर्षण-विकर्षण बसा हुआ है. न वह तुम्हें बताएगा, न वह सब जानकार कुछ लाभ होगा. कुछ भी कहीं क्यों है? ये जानना एक मीठी चाहत ज़रूर है मगर हर हासिल के आगे एक नयी तकलीफ है. किसी और सिम्त बढ़ जाने, कुछ और जान लेने की. 

मैं एक कोने में रखता हूँ अपना प्याला जिसमें जिंदगी नहीं वरन एक बहाना भरा है. बहाना वक़्त के गुज़र जाने के इंतज़ार का. 
***

हल्की नीली रोशनी के कालीन पर बनती हुई आदमकद छायाओं के बेढब पैबंद ठहरे हुए हैं। लोग बार चेयर पर सहारे को पंजे रखे ज़रा सीधे और बहुत से गुम बैठे, उदासियों को तरल में घोलते चुप पी रहे हैं। इत्र की ख़ुशबू में घुला हुआ धुंआ और नीम रोशनी में भी नहीं छुप पाता लोगों की बेख़याली का अक्स।

ड्रेस अप होकर, कोने के सोफ़ा पर बैठा सोचता हूँ कि क्या पहले खत्म हो जाये तो अच्छा. 
***

उस रात बहुत देर हो गयी थी।
एक पार्टी में बच्चे लोकसंगीत सुन रहे थे। मैं लॉन में एक मोढ़े पर बैठा था। अचानक उसने कहा- सर वन मोर। मैंने कहा- नो थैंक्यू। उसने जाने क्या सोच कर पूछा- आर यू वर्किंग फॉर केयर्न। मैंने कहा- नो आई वर्क्स फॉर आल इण्डिया रेडियो। उसकी शांत आँखों में पहाड़ की किसी लड़की की सूरत कौंधी होगी। उसने कहा- सर माई फेवरिट सॉन्ग इज लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो।
***

उसकी वर्दी अच्छी है। उसकी वर्दी से ज्यादा अच्छी उसकी पहाड़ी आँखें हैं। इससे भी अच्छा है कि वह कई साल से रेगिस्तान में है। उसका ये कहना सबसे अच्छा लगता है कि वह यहाँ खुश है। शायद पहाड़ के लड़के भी एक दिन जान जाते हैं कि रेगिस्तान के दुःख पहाड़ों से अलग नहीं है।

वह ज़रा झुका हुआ था, जब उसने कहा- सर, नाइस टू सी यू। मैंने समझा उसने पूछा है- ब्लैक डॉग ऐंड क्लासिक अल्ट्रा माइल्ड।
***

उल्फ़त,
अपनी कत्थई अँगुलियों से कह दो
कि वे ज़रा मेरे नाम को छू लें।
***

प्रेम कल्पना में भव्य
और असल में
जीने की साधारण ज़रूरत होता है।
***

भरे प्यालों में
खत्म होने का इन्तज़ार है,
खाली प्यालों में भरे जाने का।
***

हमेशा सुनने का मन रखना।
इससे बड़ा उपकार कुछ नहीं है।
***

[Painting by Johnny Morant]

August 8, 2015

कहाँ है तुम्हारी प्रेमिका

लिखना सबसे चिपकू व्यसन है. एक अक्षर मांडो तो पीछे एक कतार चली आती है. एक बार शुरू होने के बाद दिन-रात उसी में रम आते हैं. इसलिए अक्सर शब्दों को छिटक कर रेगिस्तान पर तने आसमान को चुप निहारने लगता हूँ. छत से रेलवे ओवर ब्रिज दीखता है उस पर गुजरते हुए दुपहिया-चौपहिया वाहन मेरी गुमशुदगी पर दस्तक की छेड़ करते हैं. मैं पल भर को आकाश के विस्तृत वितान के सम्मोहन से बाहर आता हूँ और फिर उसी में लौट जाता हूँ.

लिखना बस इतना था कि मुझे नीला रंग प्रिय है.
***


आँख भर नीला रंग। 
तुम्हारे कन्धों पर ठहरा हुआ।
***

वो जो हम समझे थे 
असल में बात उतनी ही नहीं थी।
***

छत, खिड़कियां, दीवार, 
अलगनी और नीम अँधेरा 
जैसे सब आ बैठें हों किसी ख़ामोशी की क्लास में।
***

अल्पविरामों से भरी एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। 
मगर गुज़रती हुई।
***

याद भीगी छत से टपकता है एक ख़याल। 
ज़िन्दगी एक करवट चुप देखती है।

शायद देखती है।
***

जितने रंग थे, उन रंगों से अनेक रंग खिलते गए. जितनी आवाजें थी, उन आवाज़ों में अनेक आवाजें झरती रहीं. जितने मौसम थे, उन मौसमों में अनेक मौसम साथ चलते रहे.

हमने ज्यादातर को न देखा, न सुना और न महसूस किया.
***

सिगार बुझ गया है सिरे तक आने से पहले
इस बात पर जाने क्यों मोहब्बत का ख़याल आया।
***

एक मकड़े ने दुछत्ती से
हवा में लगाया गहरा गोता
और वापस लौट गया।

शैतान को
उसकी अंगुलियां छूने की याद आई
और आकर खो गयी।
***

जा चुकी है भीगी रात
उम्र के लिबास से झड़ रहे हैं
बरस आहिस्ता-आहिस्ता।
शैतान तुम कहाँ हो, कहाँ है तुम्हारी प्रेमिका।
***

बालकनी को चूमती
पंजों के बल खड़ी है गंधहीन पुष्ष-लता।

उनींदी, रात की याद से भरी।
***

ताज़ा खिली घास की ओट से
नन्हे बैंगनी फूल मुस्कुराते हैं।

खुले मैदान के वितान पर बादलों ने लिखी है ज़िन्दगी।
***

कुछ चीज़ें जब आपका रास्ता रोक लेती हैं तब उनका इशारा होता है कि सुकून से बैठकर अपने अतीत को याद करो।
***

तलब क्या लिखी और सामां क्या लिखा है। 
अपनी इस लिखावट पर ज़रा झाँक तो डालो ज़िन्दगी।
***
[Watercolor painting; Artist unknown ]

July 4, 2015

सुपना ऐ सुन

मिथ्या स्वप्न से वास्तविक जाग।

कल रात की नींद में मैं एक स्वप्न जी रहा था। दफ़्तर की एक महफ़िल में लतीफ़ा सुनाते हुए मुझे किसी आड़ से एक कुलीग दिखाई दी। उन्हें देखते ही बोध हुआ कि लतीफ़े की प्रकृति इस अवसर के अनुकूल नहीं है। उनको अपनी तरफ देखते हुए देखकर कंपकपी हुई। ये झुरझुरी हवा की ठण्ड के कारण थी। मैं छत पर चारपाई पर बिना कुछ ओढ़े सो गया था। हवा की ठंडक ने मेरा स्वप्न तोड़ दिया। मैं कमरे में गया। तकिया और चादर लेकर फिर से लेट गया।

स्वप्न में अनुचित होने का बोध ये संकेत करता है कि वह एक मिथ्या स्थिति नहीं है। स्वप्न हमारी जागृत अवस्था की तरह सीखे गए अनुचित को अपने साथ लिए हुए था। अवचेतन या अर्धचेतन स्थिति में वह कौन है जो सावचेत करता है। डराता है। रोकता है। अगर वह स्वप्न भर है। मन का उलझ हुआ विकार या प्रकृति भर है तो वहां इन सब की उपस्थिति क्यों है?

यही सोचते हुए मुझे नींद आ गयी कि सम्भव है स्वप्न एक वास्तविक जीवन है। उसका टूटना ही असल स्वप्न में लौट आना है। जो मिथ्या है वह सत्य है। जो कल्पना है वह सोच के भीतर और दृश्य से दूर एक और सत्य है। संभव है स्वप्न सत्य और जीवन मृत्यु की एक अवस्था भर है।

उसे देखकर मैं सम्मोहन में चला गया था। वह शायद मेरी कोई परिचित रही है ऐसा आंशिक बोध था लेकिन उसका रूप अनेक रूपों से बना हुआ था। वह ऍन ब्रोंट जैसी दिख रही थी। उसे स्वप्न में देखा था। मैंने लगातार स्वप्न याद रखने की कोशिशें की और उनको लिखा।

मेरी एक कहानी है 'धूप के आईने में' इसी शीर्षक से कहानी संग्रह भी है। इस कहानी में मेरे देखे हुए स्वप्न हैं। कहानी की रचना प्रक्रिया के बारे में अगर पाठकों को ये बताया होता कि ये सब लेखक के देखे हुए असल स्वप्न है तो उसके पठन में एक खास आसानी घुल जाती। यही सोचकर मैंने किसी को कुछ न बताया। इसके बारे में सिर्फ वे दोस्त जान सकते हैं जो मेरी डायरी हथकढ़ पढ़ते हैं।

एक बार क़ैदखाने में मैं उस लड़की से मिला। उसने मुझे बताया कि यहाँ से किस आसानी से बाहर निकला जा सकता है। मैंने वही किया। फिर पाया कि मैं एक जेल में नहीं घर में क़ैद था। इस स्वप्न के बाद मेरी किताबों की चर्चा होने लगी। अप्रत्याशित रूप से कहानियां पढ़ी गयी। तो मेरा मन एक कैदखाना था। मैं वहां से बाहर आया। भीतर जो था उसे स्वतन्त्र कर दिया। और वो जो लड़की मुझे क़ैदखाने में मिली थी वह सिलीगुड़ी जैसे शहर मैं रहने से घबराती थी।

क्या स्वप्न हमारे हाथ लगा जीवन का एक अनिश्चित टुकड़ा भर नहीं है? या वह ही हमारा मार्गदर्शक है और हमने उसे मुलाकात का वक़्त बेमन से दिया है। जब भी इस जीवन से अपॉइंटमेंट मिले उससे खूब गहराई से मिलिए।

धूप का आईना दूर तक फैला हुआ था। पीले रंग के फूल ही फूल खिले थे। बाद मुद्दत के मिले लड़के को लड़की ने अपने पैराहन में छुपा लिया। लड़के ने कहा तुम रो रही हो? उसने कहा- नहीं। मगर वह रो रही थी।

[Painting Image; Barbra]

June 15, 2015

जून के सात दिन-रात

कई बार हमें लगता है कि किसी एक चीज़ के कारण हमारे सब काम रुके पड़े हैं. कई बार उस चीज़ के न होने से मालूम होता है कि ऐसा नहीं था. क्या इसी तरह हमें ये समझना सोचना नहीं चाहिए कि जो कारण हमें सामने दिख रहे हैं वे इकलौते कारण नहीं है. 

इसलिए सोचिये, योजना बनाइये और धैर्य पूर्वक काम करते जाइए. 

ये कुछ रोज़ की डायरी है. तारीख़ें मुझे याद दिलाएगी कि ये दिन कैसे बीते थे. 

June 8 at 11:41pm ·

आवाज़ का दरिया सूख जाता है
उड़ जाती है छुअन की ज़मीन।

मगर शैतान नहीं मरता,
और न बुझती है शैतान की प्रेमिका की शक्ल।


June 9 at 12:09am ·

शैतान के घर में होता है 

शैतान की प्रेमिका का कमरा। 
जहाँ कहीं ऐसा नहीं होता वहां असल में प्रेम ही नहीं होता।
* * * 

सुबह से आसमान में बादल हैं। 

बिना बरसे ही बादलों की छाँव भर से लगता है कि ज़मीं भीगी-भीगी है।

किसी का होना भर कितना अच्छा होता है।
* * *

June 10 at 1:03pm ·

अतीत एक साया 

इसलिए भी नहीं होना चाहिए 
कि जितना आपने खुद को खर्च किया है, 
वह कभी साये की तरह अचानक गुम हो जाये।
* * *

ओ प्रिये
एक दिन सब ठिकाने लग जाते हैं, 

हमारे दिन भी लगेंगे. 
तब तक तुम जब भी ज़िन्दगी पियो 
ज़रा सा इशारा मुझे भी कर दिया करो.
* * *

June 11 at 3:38pm · 


सुबह छितराई हुई बूँदें बरस रही थी। मौसम सुहान था। अभी उमस है।
कि कुछ भी स्थायी नहीं। 


फिर वो ख़ुशी का उल्लास किस बात के लिए था, दुःख के आंसू क्यों थे।
* * *

June 11 at 3:50pm
उसकी नींद बाकी थी या वह प्रतीक्षा की ऊब में नींद से भरने लगी थी। उसने पैरों को कुर्सी की सीट पर रखा हुआ था। उसका सर दीवार का सहारा लिए था। उसके पीछे की दीवार पर सफ़ेद और हरे रंग की अनेक पट्टियों वाला चार्ट लगा था। सर्जरी के कई मास्टरों के नामों की कतार नीचे ज़मी तक गयी हुई थी। उसकी नींद में शायद स्टील के चमकते हुए किसी औज़ार दस्तक दी या घर में खेलते हुए अपने बच्चे के गिर पड़ने के ख़याल से चौंक से भर उठी।

उसने अपना सर फिर से दीवार से टिका लिया। गुलाबी चप्पलें कुर्सी की सीट के नीचे अविचल पड़ी रहीं।
* * *

June 11 at 11:18pm 


बालकनी को थपकियाँ देती ठंडी हवा 

और दूर टिमटिमाता जयपुर शहर।

सुनो जाना, ये याद है कि कोई अमरबेल है ।

June 12 at 11:00pm 


आज एक मुंह फेरकर खड़ी दीवार को देखा 

तो अचानक तुम्हारी याद आई।

June 14 at 11.12pm


कभी-कभी लगता है 

कि ज़िन्दगी लकड़ी का घर हो गयी है। 

तुम्हारी याद की हर चाप पर सबकुछ थरथराता है।
* * *


May 28, 2015

उम्मीद की केंचुलियाँ

रातों को कभी नीरवता और कभी आंधियों का शोर. एक के बाद एक हवा के झौंके. भूल से या जानबूझकर खुली खिड़कियों के पल्ले टकराते हुए. अचानक कोई शीशा चटककर खन्न की आवाज़ से बिखर जाता है. इस चटक से जन्मे एक उदास लम्हे को हवा की अगली लहर उड़ा ले जाती है. रात आहिस्ता सरकती है. हवा मिट्टी से भरे थपेड़े लिए हर शै से पूछती है- भाग चलोगे मेरे साथ? कि इस शहर में अब कुछ नहीं बचा.

करवटें टूट कर नहीं गिरती. काँटों या पत्थरों की तीखी धार से रगड़ कर सांप जैसे अपनी केंचुली उतारता है ठीक वैसे ही बिस्तर से बार-बार रगड़ कर करवटों को विदा कहना होता है.

तुम मर गए क्या?

नींद जब दोपहर बाद चटकती है तो लगता है, जिस बदन के शीशे में ज़िन्दगी का आसव भरा था वह खाली हो चुका है. खाली शीशा लुढ़क रहा है. लुढकता भी कहाँ है? बस एक करवट पड़े हुए लुढकने का ख्वाब देखता है.

असल में हम एक दूजे से नहीं बिछड़े, हम उम्मीद से बिछड़ गए हैं.

आओ उदासी से भरा कोई डूबा-डूबा गहरा लोकगीत गायें. ऐसा गीत जिसमें इंतजार की शाखों पर आस के फूल न हों.

कि पतझड़ आने पर पत्ते टूटते थे शाखों से
कि शाखों से पत्तों के टूटने पर पतझड़ आता था।

कुछ कहो जाना।
* * *

कि कुछ लिख भेजूं।
लेकिन कोई हरारत पसर जाती है।
टूटे बदन से बंधी अंगुलियां नाकाम पड़ी रहती है।
छोटी झपकियों में बेमुराद ख़्वाब बनकर बिखरते रहते हैं।

हर एक दिन असल में सरल रेखा नहीं है।
* * *

कितनी ही करवटें
घर में फाहों सी उड़ती हुई।
बालकनी से दीखता है एक रास्ता
तुम्हारी आमद के इंतज़ार में जगा-जगा।
* * *

वक़्त 

सिर्फ बहती-उड़ती शै नहीं है।
वह एक ठहरी हुई बारिश भी है।
जहाँ शब्द और विन्यास गुम है।
सिर्फ एक भारीपन
कि आप देखते हैं गुज़र कर भी कुछ नहीं गुज़र रहा।

तुम कहाँ जा रहे हो?
ये पूछकर ठहर गयी आँख भी वक़्त ही है।

* * *

पोस्ट के साथ लगी ये तस्वीर प्यारे ब्लॉग कबाड़खाना से ली है.

वेलेरी हादीदा के शिल्प
समकालीन फ्रेंच पेंटर और वास्तुशिल्पी वेलेरी हादीदा अधिकतर कांसे और मिट्टी के माध्यमों पर काम करती हैं. आज उनकी कुछ अनूठी वास्तुशिल्पीय कृतियाँ देखिये जिन्हें ‘लिटल वूमेन’ सीरीज का नाम दिया गया गई. आलोचक इस सीरीज के बारे में कहते हैं: “यह एक काव्यात्मक भिड़ंत है जो हमें स्त्रियों द्वारा पार किये गए उन तमाम रास्तों की बाबत बताती है जो उन्होंने युवावस्था से प्रौढ़ होने तक पार किये होते हैं और उन तमाम संवेदनाओं और मूड्स की बाबत भी जो स्त्रियों की इन पीढ़ियों के जीवन का संबल हैं.”

May 11, 2015

कॉलर पर टँगा सफ़ेद ईयरफोन

फोन में लगे होने की जगह ईयरफोन का 3.5एमएम का जैक उसके मुंह में था। और नज़रें कहीं दूर क्षितिज में अटकी हुई थी।

हालाँकि उसे मालूम था कि जीवन का अप्रत्याशित होना अच्छा है।
***

उसे उन दोनों के सस्ते और अमौलिक ड्रामों के बारे में कुछ मालूम न था। उसे ये जानना न था कि वे दो और उनकी मण्डली मिलकर कैसा रूठने-मनाने, जीने और मर जाने का सजीव प्रसंग खेलते हैं। उन दो के बीच निष्पादित रसों का स्थायी भाव प्रेम, मित्रता या मसखरी या कुछ और था ये जानना भी उसकी रूचि न था।

मगर अचानक कभी-कभी उसका जी चाहता कि अपने फोन की प्ले लिस्ट को सर्फ करे। अपने गले के पास कॉलर से लटके ईयरफोन को छुए।
***

हाँ ठीक है। अच्छा। ओके। कब। ओह। ऐसा क्यों। हूँ। हाँ-हाँ। इसी तरह की बातें करते हुए उसकी अंगुलियां ईयरफोन के सफ़ेद लंबे तार से खेल रही थी। आखिर में उसने कहा- हाँ लव यू टू।

फोन कटने के ज़रा देर बाद उसने देखा कि ईयरफोन के तार में अनगिनत गांठे पड़ चुकी थी। मौसम में गरमी बहुत ज्यादा थी और तन्हाई पहले जितनी लौट आई।
***

एक रोज़ बच्चे ने पूछा- क्या थोड़ी देर के लिए आपका ईयरफोन मिल सकता है। उसने थोड़ी देर सोचा और ईयरफोन बच्चे को दे दिया।

बाद में उसने बहुत देर सोचा कि ईयरफोन देने से पहले थोड़ी देर क्यों लगायी थी। थोड़ी देर उसने क्या सोचा था?
***

जब उससे बात होती तब ईयरफोन का लेफ्ट पीस कान में लगा होता। ताकि बात करते समय दुनिया की आवाज़ें भी ख़याल में रखी रहें और कोई अनहोनी न हो। असल में उसकी चाहना थी कि दोनों कानों में ईयरपीस लगाकर मोहोब्बत को संगीत की तरह सुन सके।
***

उसके गले में एक लम्बे सफ़ेद तार वाला ईयरफोन लटका रहता था। संगीत उसके लिए सम्मोहन और उद्दीपन का सहारा न रहा था और फोन किसी का आता न था। एक बेख़याल इंतज़ार की तरह, वह ईयरफोन उसके साथ था।

बिना किसी ठोस वजह के ईयरफोन था, ज़िन्दगी भी थी।
***

पहले मेहदी फिर जगजीत और उसके बाद नुसरत की आवाज़ बजती थी। कुछ साल बाद न म्यूजिक प्लेयर ऑन होता न कानों में ईयर फोन। मगर वे आर्टिस्ट उसके भीतर गाते रहते थे। हर सुर, आलाप, गिरह और तान सबकुछ नियम से सुनाई देता। ज़रूरी ख़ामोशियाँ भी सही जगह लगती थी।

प्यार होने पर बहुत सी चीज़ें न होकर भी होती रहती हैं।

May 5, 2015

ओ मुसाफिर ! ये बस पीले और टूटे पत्ते भर हैं

हसरतों के पत्ते पीले होकर गिरते रहते हैं। मुसाफ़िर रफ़ू की हुई झोली में सकेरता जाता है। सफ़ेद फूलों वाला कम उम्र दरख़्त कहता है- मेरे कोरे पीले और टूटे पत्ते ही तुम्हारे हिस्से में आते हैं। तुम ऊब नहीं जाते। क्या तुमको थकान नहीं होती।

मुसाफ़िर मुस्कुराता है।

जाना तुम्हारी छाँव के साथ प्रेम बरसता है। ज़िन्दगी की तल्खी में नरमाई उतरती है। इसमें डूबे हुए कभी लगता नहीं कि पीले पत्ते सकेर रहा हूँ। लगता है, तुम थोड़ा-थोड़ा मेरे हिस्से में आ रहे हो।

शाम गुज़र गयी। कोई तन्हाई आई। कोई खालीपन उतरा। कोई आवाज़ दूर हुई। इसे भरने के लिए यादों का कारवां चला आया। उड़ता-गरजता और सब तरफ से घेरता हुआ। कोई याद का चश्मा नुमाया हुआ। हल्के छींटे बरस-बरस कर बिखरते गए। भीगा लिबास ज़िन्दगी का। याद होने की, जीने की, रूमान की।

जाना, कहो तो। हम जैसे हैं क्या हम पहले से बने हुए थे या हम ख़ुद बने। बोलो, कुछ उसी तरह जैसे भरी-भरी आँखें जवां दोपहर को कह रही थी- ये सुख है। आत्मा खुश है। दुनिया से कह दो- आगे जाता हुआ पहिया ज़रा देर रोक लो।

दूसरी ओर आमीन, आमीन। 

May 2, 2015

न ऊब न प्रतीक्षा


शब्द अपने अर्थ के साथ सम्मुख रखे हुए किस काम के, जब तक वे स्वयं उद् घाटित होकर भीतर प्रवेश करने को आमंत्रित न करते हों।


April 29

जाना, आग के फूल न बरसते, बारिशों के फाहे गिरते तो रेगिस्तान क्या रेगिस्तान होता।

उदास ही सही, ज़िन्दगी सुन्दर चीज़ है।


क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी कहानी है।

ज़िंदा शहतूत के तने में नुकीले दांतों वाले मकोड़ों ने घर बना लिया हो। लाल चींटियों ने चाक कर दिए हों पत्ते। बकरियां दो पंजों पर खड़ी होकर जितना चर सकती थीं चर गयी हों। बच्चों ने टहनियों की लचक की सीमा से आगे जाकर तोड़ दिया हो। पेड़ के मालिक ने काले-लाल और कच्चे हरे शहतूत, कुछ तोड़ लिए कुछ मसल दिए। और वो जो शहतूत का कीड़ा होता है उसकी भी कोई बात शामिल हो।


April 28

तुम एक पिरोये हुए फूल हो। दिल बेवकूफ़, अपने ठिकाने पड़े रहो।

अतीत की जाली छनकर गिरने नहीं देती, फटकती रहती है भविष्य की ओर उछाल-उछाल कर।

अचानक किसी दोपहर हम खुद को पाएं खाली पड़े हुए पुराने प्याले की तरह। नमी, नाज़ुकी, ज़िन्दगी जैसा कुछ न बचा हो। बस हम पड़े हों बिना हरकत, बिना जान के।

तो....


अभी-अभी एक सूखा पत्ता गली से दौड़ता हुआ गुज़रा। आखिरी छोर पर दीवार के पास कोने में बैठे खालीपन ने उसे अपने करीब खींचकर छुपा लिया।

आओ मोहोब्बत करें। शायद यही कहा होगा।


काश मैं लिख पाता कि रेगिस्तान में कहीं किसी घर की छत पर बैठा हुआ एक आदमी कैसा दिखता है। ताज़ा बोसों के दो हल्के निशान और उसकी आत्मा पर पड़ी हुई अतीत के अनगिनत बोसों की मोहरें कैसी दिखती है। क्या उसके पास बची है किसी रूमान की दिलफ़रेब याद।

काश लिख सकूँ कि खर्च होते-होते कितना बचा है वह आदमी। जो रेगिस्तान में कहीं किसी छत पर बैठा है।


April 26

हर रंग की शाम एक दिन बिखर पड़ेगी तुम्हारे आस-पास। ख़ुशी या तकलीफ से भरी। प्रेम या इंतज़ार से भीगी। गहरे अफ़सोस या बेहिसाब सुकून से भरी।

जो नहीं हुआ, वह होगा।

आज शाम को डूबते हुए सूरज को देखा। ये भी एक अरसे से बाक़ी था।

धूप के शबाब में स्टेशन रोड पर उल्फ़त की दुकाँ के आगे एक ट्रॉली भरी पड़ी है शर्तिया दवा से। दवा बेचते उदास सांवले लड़के के चेहरे पर लिखा है नाउम्मीद इंतज़ार। एक रॉयल एनफील्ड मेरे आगे चलती हुई। नौजवान लड़का धूप का चश्मा चढ़ाये अपने मेरुदण्ड पर तना हुआ। मारवाड़ी पोशाक में गहरे रंग के घाघरे पर लहरिया ओढ़े मोटर सायकिल पर पीछे बैठी औरत की गोद में तोलिये में लिपटा हुआ रेगिस्तान का एक नन्हा बाशिंदा। एनफील्ड की कर्णप्रिय राजसी आवाज़ और सायलेंसर से आते हवा के स्ट्रोक्स मेरे हेलमेट को छूकर बिखरते हुए। मन फिर से स्टेशन रोड का फेरा देता हुआ अचानक जेल के पास से आकाशवाणी की तरफ मुड़ जाता है। नीम के नीचे रुकते ही सोचता हूँ कहाँ आये हो केसी और फिर कहाँ जाओगे।

ज़िन्दगी सा सूदखोर कोई नहीं।

बंद बात की ख़ुशबू सबसे अधिक मादक होती है।

आओ चुपचाप।


उदासी कि शाम, जाने कौन किसके कांधे पर सर टिकाये था।


दूर होने से क्या हो जाता है दूर, पास होकर भी सब कहाँ कुछ पास होता है?

आज तुम जहाँ हो उम्र भर वहीँ रहोगे।

April 25

गमले में पसरी उदासी के बीच कोई हरापन झांकने लगता है। उसे देखकर गमले के धूसर रंग में हरे रंग की झाईं खिलने लगती है। कुछ रोज़ में धूसर और हरा रंग आपस में मिलकर एक नया रंग हो जाते हैं। और आदतन पौधे के याद आता है कि वह आकाश की ओर बढ़ने के लिए दुनिया में आया है। गमला कहता है तुम इतने ही ठीक हो। तुम और बढे तो मैं टूट जाऊँगा। एक आज़ादी का सवाल एक ज़िन्दगी के सवाल पर भारी हो जाता है। कुछ रोज़ की लड़ाई के बाद गमला उस खूबसूरत पौधे को आज़ाद ज़मीन में रख देता है। ऐसे ही सालों बाद जब हवा पानी ठीक होते गमले में कोई नया रंग खिल जाता। हरियल पौधे आज़ाद आकाश की ओर बढ़ते जाते।

सबकी अपनी चाहनाएं, सबकी अपनी नियति।

जिन घुंघरुओं के अंदर बीज नहीं होता। उनको खनकने के लिए दीवारों से सर फोड़ना पड़ता है।


जो कभी टूटा न हो, वो प्यार नहीं है। वो दो तरफा ऋण है जिसकी किश्तें बराबर चुकाई जा रही हैं।


वह न ऊब में है न किसी प्रतीक्षा में। न ही वह ध्यान के आनंद में है। वह बस जिस तरह बनी उसी तरह ठहरी हुई है। इस ठहराव पर गिरी किसी नज़र की छुअन। मद्धम, विलम्बित अथवा द्रुत। लरज़िश। कोई अनगढ़-सुघड़ आवृति। टंकार का सुरीला गान। और फिर ख़ामोशी। ताकि सेंसेज़ को जगा कर जो अभी गुज़रा उसे पढ़ा जा सके। वह एक सुर था, जो ठहराव के भीतर जगा। जिसने ठहराव के छद्म को तोड़ा। जिसने विस्मय से भर दिया किसी धातु को किसी जीवन को।

वही प्रेम है।

जैसे हवा ने किसी को छुआ। जैसे मैंने फेरी तुम्हारी तस्वीर के रंगों पर अपनी अंगुलियां।


March 28, 2015

तुम मेरी फेवरेट ड्रग हो।

गर्मियां अचानक आई। एक पल में बदल गया सब कुछ। रूह पर जैसे कोई आंच का लिबास उतरा। रात-दिन छोटे बड़े हिस्से चुराते हुए कभी कोई लम्बा अंतराल कुंडली मारने लगता। मन उदासी की गति में, तन शिथिलता की ओर। फिर अल्पविरामों के प्रेम में पूर्ण विराम के भय से सिहरे हुए भारी-उखड़ी सांसों के मध्य लव स्माइली और छोटी-छोटी पुकारें बिखर जाती हैं। दुनिया की गिरहों से परे, दुनिया से किसी चाहना के बिना, बस एक बार रेत की पीठ के तीखे कटाव के पास प्रेम लिख देने और फिर मिटाकर चले जाने की सोच में खोयी हुई नाकारा, बेढब, बेसलीका ज़िन्दगी। सिर्फ बेदिली और इंतज़ार जिसका हासिल है।

ये कुछ एक बातें कभी किसी दोपहर या रात को छत पर लेटे तारों को देखते हुए कह दी। उस तक पहुंचे भी तो क्या वह समझ सके? कमसिन अल्हड़पन कई बार उम्र का मोहताज़ कहाँ होता है। कब सादगी समझती है पेचीदगी को। कल दिन को लू चूमती रही। आओ मेरे केसी तुम्हारी बाँहों और गरदन पर लिख दूं ताम्बई रंग। लिख दो जाना जो लिखना चाहो। एक ज़िन्दगी है जो थोड़ी सी बाकी है...

जैसे शाम ठिठकी हो बुझने से पहले
रात आग़ाज़ को झुकी जाती हो।

तुम उधर इंतज़ार में, मैं इधर बेक़रारी में
* * *

गरम दोपहरों वाले मौसम के साथ एक कश्मीरन लड़की ने दस्तक दी।

रेत भर हैरत पसर गयी है।
* * *

जिस किसी ने कहा था
तुमसे मोहब्बत थी इसलिए शादी की
अब जाने क्यों मोहोब्बत नहीं है मगर वादा कायम है।

ऐसे लोगों से अच्छे कहलाये वे लोग
जिन्होंने वादे सब तोड़े मगर कहा मोहोब्बत कायम है।
* * *

जी चाहता है तुम्हारे पहलू में सिमट जाऊं
फिर ख़याल आता है रहने दो कि जी और भी बहुत कुछ चाहता है।
* * *

दो दिन और रात बरसती रही रेगिस्तान की आंधी की काली पीली रेत। ऊंटों का टोला बैठा रहा बिना जुगाली गोल घेरे में। मुसाफिरों ने छोटे तुंबुओं से झाडी नहीं धूल।

प्रेमिकाएं मगर कोसती रही इंतज़ार को।
* * *

डॉक्टर ने कहा दुरस्त है तुम्हारी आँखें
ये सिर्फ इंतज़ार की चुभन का दर्द है।

शैतान की आँखों में उतरा है रोग नया।
* * *

तुमने मुझे क्या कुछ दिया है सोचकर मन प्रसन्न हो जाता है। इसके कुछ देर बाद मेरा लालच असंख्य तकलीफें बटोर लाता है।
* * *

अब फिर वही सब गुज़र रहा होगा। बाद इसके वही सब गुज़रेगा।
* * *

जो पेशानी की सीध में था सितारा
अब वह टूटा तो गिरेगा उस कान के पास
जिसमें तुम्हारे होठ सरगोशी फूंकते हैं।

शैतान ! ओ शैतान मैं प्रेमिका हूँ तुम्हारी।
* * *

रोहिड़ा कुछ रोज़ आकाश को
फिर धरती को रंगता है अपने फूलों के रंग से।

जाना अब तुम भी टूटकर गिर पड़ो मुझपर।
* * *

गरमी ने इस तरह दस्तक दी है
जैसे गुबरैले रेत पर भागे जातें हों कहीं घर बसाने को।
जाना क्या तुमने भी सोचा है
कि कोई दस्तक दूं, हम कहीं बस जाएँ ठंडी जगह पर।
* * *

एक तेरा वो कहना
कि उम्र भर याद रहेगा मुझे
कैसे कैसे लोगों को बरदाश्त किया है तुम्हारी खातिर।
* * *

अगर वह टूट पड़े तो
सीधा मेरी पेशानी पर आये।

एक तेरी याद सा तारा आसमान में चमकता है
* * *

नींद उतरती है
कच्ची बात की तरह ठिठकी हुई।
तुम जो पास रहो तो कोई नयी शिकायत भी आये।
* * *

झूले में एक मद्धम मचल है
तुम्हारी बाहों की तरह।
रात के आठ चालीस हुए हैं।

ज़िन्दगी किसी गुज़री हुई चीज़ का नाम नहीं है।
* * *

तलब बेहिसाब और लम्हे ज़िन्दगी के कम-कम। एक बेवक़्त की बेख़याली में कही बात लिपटी रहती है ज़िन्दगी की शाख से। मुझे तुम्हारे तंज भी प्रिय हैं। और तेरी याद भी, जैसे सूखी बेल की धूसर सलवटों से झांकती कच्चे हरे रंग की कोंपलें।
* * *

March 13, 2015

जंगल गंध वाली व्हिस्की

काश शैतान को आता
अपनी माँ की संभावित मौत को कैश करना
ईमानदारी का ढोंग पीटते हमसफ़र को धोखा देना
दोस्त बनकर दोस्त चुराना।

तो वह भी प्यारा हो सकता था
जिसका करता हर कोई इंतज़ार।

शैतान को प्यारा होना पसन्द नहीं है इसलिए बस वो ऐसा नहीं है।
* * *

वो मेरा नहीं है इसका यकीं है मगर
उसकी चाहतों में मुकम्मल मैं भी हूँ।

इश्क़ मैं, तुम भी
कभी हो जाना गोरखनाथ का चेला
और भीख में माँगना सिर्फ मोहोब्बत।
* * *

और तुम्हे पता है इश्क़
कि जंगल की गंध वाली व्हिस्की
मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है।

जैसे तुम नहीं मिलते
वैसे वह भी नहीं मिलती।

क्या मैं रो सकता हूँ इस बात पर?
* * *

शैतान ने कहा है तुमसे
कि हो जाना
अमेरिका सा तानाशाह
या फिर
जन्नत की झूठी तकरीरें करना
स्वर्ग के नकली स्वप्न दिखाना।

कुछ भी करना
मगर मुझे बाँधकर रखना अपने पास।

कि तुम बिन शैतान तनहा है।
* * *

दीवारों पर टूटती अंगड़ाइयों के साये
बिस्तरों पर सलवटों के निशान
गले में पड़े स्कार्फ के नीचे धब्बे
और खुशबुएँ सीलेपन की।

शैतान सब जानता है
मगर एक मोहब्बत तुम्हारी जाने क्या चीज़ है?
* * *

फरेब और वफ़ा के बीच
सिर्फ मोहोब्बत भर का फासला था।

इश्क़ मैं, तुम इसी वजह से करीब हो।
* * *

मोहोब्बत में हर कोई चाहता है
इस तरह करीब होना कि भड़क कर बुझ जाये।

शैतान मगर सीली माचिस की तरह इंतज़ार करता है।
* * *

याद के रोज़नामचे से
आहिस्ता से उड़ जाती हैं
हरे नीले रंग की परियां।

समन्दर के किनारे
ख़ानाबदोशों के टेंट से झांकती हुई आँखें
ज़िन्दगी भर साथ चलती हैं।

शैतान मुस्कुराता है आँखें सोचकर।
* * *

शैतान तुम्हारे प्यार में
हो जाता है एक लकड़हारा
छांट देता है दिल के जंगल का घना अँधेरा।

तुम भी कभी दियासलाई हो जाओ।
* * *

आँखों से उगना
दिल में बुझ जाना।

आकाश भर रखना मोहोब्बत।

बस डूबती नब्ज़ को भूल जाना
कि आखिर वह एक शैतान है।

तुम्हारा शैतान, अविनाशी।
* * *

वाद्ययन्त्र के बहत्तर हिस्सों में
सुर अलहदा मगर रूह एक है।

शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका।
* * *

हम भूल जाते हैं
बहुत सी चीज़ें कहीं रखकर
फिर धीरे धीरे भूलते जाते हैं
कि कहाँ रख रहे हैं अपने दिन-रात।

बेख़याली में होना कोई अचम्भा तो नहीं
मगर तुम भूल गए अपनी याद मेरे पास।

कभी उसे लेने आओ,
शैतान तुमसे मिलने की आस में रहता।
* * *

इश्क़ मैं, वे जो संगमरमर की मूरतें थीं, वे जिनकी हैसियत शाहों से ऊँची थी, वे जो बर्फ की ठण्ड से सफ़ेद थे। उनके बारे में लिखा था और लिखना जाया न गया कि अतीत के आइने में अब वे सूरतें आसानी से पढ़ीं जा रही हैं। किसी हुनर, इल्म, शक्ल के कारण मोहोब्बत करना गुनाह है तो कहो, अब तुम्हारे बारे में भी न लिखूं कि तुमसे तो बहुत सी वजहें हैं लिखने की।

February 26, 2015

श्याम सपन में प्रिये तुम

जैतून की टहनियां बढ़ आई छत तक
मेरी नज़र उलझ जाती है श्याम पत्तों में।

तुम्हारा चेहरा गायब है झरोखे से।

(सपन श्यामल1)

दफ्अतन साया सीढ़ियों से उतरा
धड़क कर बुझने से पहले
सांसों ने थाम लिया दिल को मेरे।

तुम जो आये तो जानलेवा आये।

(सपन श्यामल 2)

तुमने रेत के कोमल बिछावन पर
रख दी अंगड़ाइयां सब करीने से।
रेत ने तुम्हारी नाभि पर बनाया है एक गोल घेरा।

मैं जल गया सूखे खारे आक की तरह ये देखकर।

(सपन श्यामल 3)

तुम्हारी करवट से रेत ने चुरा ली हैं सब लहरें।
दिल दुखे महबूब की तरह
मैंने ढक दिया तुम्हारा रूप सालू से।

सालू - एक लम्बा कशीदे वाला गले में टांगने का कपड़ा, लोंग स्टाल

(सपन श्यामल 4)

पगरखी के कसीदे ने बना दी हैं लकीरें
तुम्हारी गुलाबी एड़ियों पर।
मैंने रख दी अपनी हथेलियाँ पगरखी की जगह।

कि कहीं टूट न जाये नाज़ुक नींद तुम्हारी
धागों की चुभन से।

(सपन श्यामल 5)

घोड़े हिनहिनाते जाते हैं
और जैतून बरसता रहता है उनकी पीठ पर।

हम मगन देखे जाते हैं एक दूजे को।

(सपन श्यामल 6)

आसमान में घमासान मचा है
सफ़ेद और श्याम बादल हांक रहे हैं अपने हाथी।
एक घने दरख्त की छाँव में भीगी हुई चमकती है
तुम्हारे होठ की किनार।

(सपन श्यामल 7)

तुम किसी माया की तरह लिपट गयी हो
बदन से मेरे।
तुम्हारे पैर ज़मीन से कुछ ऊपर है।

मैं पानी हूँ तुम हवा हो।

(सपन श्यामल 8)

पीले पत्ते पर उभर आया है
दिल की शक्ल का खूबसूरत लाल निशान।

(सपन श्यामल 9)

मेरी जान ये साँस क्यों उखड़ जाती है तुम्हारी याद आते ही। बदन किसी लरज़िश से भर कर क्यों गिर पड़ता है अचानक। मन मदभरे घोड़े सा क्यों चलता है रोते हुए शराबी की तरह। अचानक आंसुओं की खेती में फसलें क्यों उग आती है। ऐसा क्या होता है कि कोई किसी के बिना डर जाता है जीने से।

जाना, ओ जाना।

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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