January 28, 2012

उसे कहना चाहता था



बेवजह की बातें...

उसे कहना चाहता था
तुम्हारे भरे हुए चेहरे पर अच्छा लगता है चश्मा
जब कभी तुम दबा लेती हो अपनी हंसी
तब दिखती हो सबसे सुंदर.

असंख्य जटिलताओं वाले प्रेम को
किया जा सकता है स्केच
चश्मा हटाने के बाद तुम्हारे सरलतम चेहरे पर
* * *

प्रेम से बड़ा नुकसान कुछ नहीं होता
कि एक दिन कोई
आपको चुरा कर चला जाता है.
* * *

[Image courtesy : South Korean Piainter Carto]

January 26, 2012

ताम्रपत्र सरीखा है, मोरचंग


उस मंडप में रह रह कर मंच से बजती थी तालियाँ और सामने कुछ सौ लोगों की भीड़ कौतुहल भरे हृदय में दबाए बैठी थी अनेक आशंकाएं. उन्होंने कहा कि हकीम खां एक महान कलाकार है लेकिन आखिर कमायचा हो ही जायेगा लुप्त इसलिए हम सब कमायचों को इक्कठा कर के सजा देना चाहते हैं संग्रहालय में, आने वाली पीढ़ी के लिए.

मोरचंग बनाने के सिद्धहस्त लुहार आजकल व्यस्त हो गए हैं लोहे की कंटीली बाड़ बनाने के काम में इसलिए मणिहारे माला राम गवारिये के पास बचे हुए पीतल के इन छोटे वाद्य यंत्रों को भी घोषित किया जाता है राष्ट्रीय संपत्ति. उन्होंने गर्वीली आवाज़ में कहा कि ताम्रपत्र सरीखा है ताम्बे से बना मोरचंग.

रंग बिरंगी झालरों की चौंध में उन्होंने तीन हाथ लंबे खोखली लकड़ी से बने वाद्य नड़ के बारे में बताया कि यूरोप के पहाड़ी गाँवों के चरवाहों के अलावा दुनिया में सिर्फ तीन ही बचे हैं इसलिए ये अनमोल धरोहर हैं.

उन्होंने धोधे खां को ओढाई शाल और श्री फल के साथ एक हज़ार रुपये से सम्मानित किया. बायीं तरफ रखवा लिया हरे रंग का झोला, संरक्षित कर लिए दो जोड़ी अलगोजा. आंसू भरी आँखों से कलाकार ने बताया कि सिंध से लायी जाळ कि जड़ से इसे बनाया था मैंने खुद, मेरे इससे है पाँच दशक के मरासिम.

वे जब कर रहे थे खुले दिल से बीन, मुरला, पुंगी और भपंग जैसे वाद्यों के होने से रेगिस्तान की समृद्ध संस्कृति का यशोगान उसी वक्त एक कवि ने जताया अफ़सोस कि लंबी मूंछों वाले नड़ वादक करना भील का काट लिया गया सर, जैसे अमरीका काट लेता है हर एक ज़ुबान, जैसे खुमैनी काट लेता है लेखक की अंगुलियां.

गूंगी आवाज़ों के नक्कारखाने में पसरा रहा मुर्दा क्षोभ. कार्यकारी अधिकारी ने किया अनूठे संग्रहालय का उद्घाटन जिसमें रखे वाद्य यंत्रों को बाहर से गोल चक्कर काट कर देखा जा सकता था. अख़बारों ने लिखा मल्टी नॅशनल कम्पनी ने सामाजिक विकास का दायित्व निभाया, कला के संरक्षण में की अनूठी पहल.

सरकार ने सम्मानित किया कम्पनी को और कवि को ये कहते हुए डाल दिया जेल में कि इसको उस कार्यक्रम में नहीं पिलाई गई थी मुफ्त की शराब इसलिए विकास के ख़िलाफ़ बकता है, जाने क्या क्या...

* * *
[Image courtesy : Chandan Singh Bhati's FB wall]

January 24, 2012

उस बज़्म में हम...

अगर धूप तल्ख़ न हो जाये तो बहुत देर लेट सकता हूँ, आसमान को तकता हुआ. सुन सकता हूँ, रौशनी के अँधेरे में डूबी उलटी लटकी रोशनदानों जैसी असंख्य खिड़कियों से आती आवाज़ें. इधर नीचे आँगन में कोई ज़र्द पत्ता विदा होने के पलों में जाने क्या कहता फिरता है कि टूट जाती है, मेरे ख़यालों की सीढ़ी...  मगर मैं फिर से लौट जाता हूँ ऊंची मेहराबों में टंगी अदृश्य खिड़कियों की ओर. याद आती है एक बेवजह की बात...

नेहरू बाज़ार की लम्बी दुकान में
चित्रकार फ्रेडरिक की पेंटिंग के क्लोन को देखते हुए
एक ज़िद्दी लट आ बैठती थी उसके कॉलर पर
और ईर्ष्यालु टेबल पंखा घूम-घूम कर उसे उड़ा देता हर बार
मैं अपने हाथ को रख लेता वापस जेब में.

सरावगी मैंशन में एक कोने वाली छोटी सी दुकान में

बची हुई थी किसी दोशीज़ा की खुशबू
गोया कोई नमाज़ी गुज़रा था इश्क़िया गजानन की गली से
और देखा मैंने कि तुम उलझी खड़ी हो जींसों के रंग में.

बाद अरसे के सलेटी जींस के घुटनों पर खिल आये सफ़ेद फूल,

सॉफ्ट टॉयज और तस्वीरों में कैद चेहरों से उड़ गया रंग
याद के आलिंगनों में आता रहा
पचास पैसे में एक ग्लास पानी बेचने वाला दुबला लड़का
सिनेमा का मैटिनी शो, अपरिचित बिस्तर और ख़ामोश उदासियां.

घर के बैकयार्ड में सीमेंट के फर्श पर लेटा हुआ सोचता हूँ

कि ज़िन्दगी का मैटिनी शो क्या हुआ?
अब ये डूबी डूबी आवाज़ें क्या हैं, ये धुंधला धुंधला दिखता क्या है?
* * *
[Image courtesy : Prateeksha Pandey]

January 16, 2012

घास की बीन


बया ने रात भर पत्तों के बीच देखा आकाश
दोपहर में किया याद, रेगिस्तान के ख़ानाबदोश सपेरों को
और फिर घने बबूल पर टांग दी, घास की बीन.

आंसुओं की बारिशों से भीगी रातों में,
ठुकराए हुए घोंसलों से उठती रही एक मादक वनैली गंध.

आदम मगर बुनता रहा, दिल के रेशों से घर, हर बार
बिखरता रहा उजड़े ख़्वाबों का चूरा
मन के गोशों से उठती रही हर बार एक उदास कसैली गंध.

क्यों एक दिन हो जाता है इश्क़ मुल्तवी, सौदा ख़ारिज,
क्यों ताजा खूं की बू आती है, क्यों परीशां परीशां हम हैं?

January 15, 2012

हसरतों के बूमरेंग


आधे खुले दरवाज़े से आती हुई रौशनी पीछे नहीं पहुँच पा रही थी. वह मुझसे दो हाथ जितनी दूरी पर खड़ी थी. गाढे रंग के कसे हुए ब्लाउज की चमकीली बाँहों और चौड़े कंधों पर अँधेरा पसरा हुआ था. दरवाज़े की झिरी से आती हुई रौशनी कम थी. उसकी आँखें मुझसे मुखातिब थी और हम शायद बहुत देर से बात कर रहे थे. हल्के अँधेरे और उजालों की छुटपुट आहटों के बीच लगा कि कोई आया है. दो कमरों के पहले तल वाले उस घर की बालकनी दक्षिण दिशा में खुलती थी.

पतली सीढ़ियों से उस स्त्री के पति की पदचाप सुनाई देने लगी. हम दोनों जड़ हो गए. एक अमूर्त अपराध की शाखाएं हमें कसने लगी. वह दरवाज़े के पीछे रसोई के आगे वाली जगह पर खड़ी रही. आते हुए क़दमों की आवाज़ों से मुझे लगने लगा कि मैं कोई गलत काम करते हुए पकड़ा गया हूँ. तूफ़ान आने से पहले उड़ते हुए दिखाई देने वाले पत्तों की तरह आशंकाएं मेरे आस पास तेजी से मंडराने लगी. जबकि हम दोनों ही नितांत सभ्य तरीके के एकांत में थे. मैं दरवाज़े के पीछे से निकल कर बालकनी की ओर चल पड़ा. लोहे की हल्की रेलिंग से नीचे देखते हुए पाया कि यहाँ से उतरना बहुत कठिन है.

स्वप्न में एक विभाजन हुआ. वह अचानक से टूटा और फिर से शुरू हो गया. उसी घर के आगे सौ फीट चौड़ी सड़क पर मैं अपनी शोर्ट चेसिस जीप को किसी धातु के टुकड़े से स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ. मेरी चाबी उसके पति ने लेकर कहीं छुपा दी है. उसके चेहरे पर इस तरह के भाव थे कि तुम्हारी इस गुस्ताखी पर ऐसा ही किया जाना चाहिए. मैंने फिर से धातु के टुकड़े को इग्निशन में डाल कर घुमाने की कोशिश की लेकिन कामयाब न हो सका. उसका पति एक शोर्ट और टी शर्ट में मुझसे पचास फीट के फासले पर अपनी एनफील्ड जैसी किसी पावर बाइक पर बैठा था. उसकी बाइक भी स्टार्ट नहीं हो रही थी.

मैंने उसे देखा और पाया कि हम दोनों की गाड़ियाँ एक सा ही बिहेव कर रही है. जबकि वह खुश है और मैं निराश परेशान सा.... वह स्त्री बालकनी में आकर नहीं झांकती. मैं एक बार फिर उसके बारे में सोचता हूँ और वह मुझे उसी दरवाज़े के पीछे खड़ी हुई ख़याल में आती है.

ये पिछले सप्ताह के आरम्भ की एक सुबह का सपना था.

* * *

आज सुबह
सपना एक कार के इंतज़ार से शुरू होता है. मैं अपनी माँ के साथ बैठा हूँ. उसी अजनबी शहर में जिसके सपने अक्सर सिलसिले से आते हैं. सामने दक्षिण दिशा में जाने वाली सड़क पर एक मॉल है. वह कभी कभी दिखता है. उसका मुख उत्तर दिशा में है. रास्ते की बीच आने वाली कॉलोनी किसी पहाड़ी बसावट की तरह है. इसी सड़क पर चलते हुए जहां समतल भूमि का आगाज़ होता है वहीं से कुछ सौ मीटर दूर मेरा फ्लेट है. मैं माँ को अपना फ्लेट दिखाना चाहता हूँ. घर में दायीं तरफ वाले वाशरूम का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है. मुझे समझ नहीं आता कि क्यों हर बार यही एक काम अधूरा सा दिखता है.

स्वप्न की कुछ रील गायब हो जाती है. अब हम सड़क पर चल रहे हैं. मॉल के आगे मेरी एक बहुत पुरानी दोस्त अपनी बहन के साथ दिखती है. स्वप्न के एलिमेंट हेंस प्रूव्ड का एलान करते हैं कि इसी दोस्त की गाड़ी में कहीं जाना है. लेकिन मैं इस बात पर सोचने लगता हूँ कि कौन कहां बैठेगा. क्या मेरी दोस्त कार को चलाएगी और उसकी बहन उसके पास आगे की सीट पर बैठेगी या मै गाड़ी चला रहा होऊंगा और वह पीछे मेरी माँ के साथ बैठेगी.

लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं. हम तीनों पैदल जा रहे हैं. दोस्त की बहन हम दोनों के बीच है. बीस एक कदम चलने के बाद मैं उसके बाएं हाथ को अपने हाथ में लेता हूँ. जैसा अक्सर मनुष्य चलते समय अपने प्रियजनों के साथ करता है. उसकी अँगुलियों में फंसी मेरी अंगुलियाँ मुझे आवेशित करती हैं. जाने क्यों मैं उसका हाथ छोड़ देता हूँ और पीछे चल रही अपनी माँ को देखता हूँ. थोड़ी दूर जाने के बाद फिर से उसके हाथ को थाम लेता हूँ. इस पकड़ से बन रही अनुभूति के नवीन आत्मीय रेशों की बुनावट से हम दोनों असहज से हैं. अथवा एक अजनबीपन को हराने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए दो बार एक दूसरे की आँखों में अपने प्रश्न रख कर फिर से सामने देखने लगते हैं.

स्वप्न में भारीपन छाने लगता है. एक ठहराव घेरने लगता है. मेरी दोस्त रो रही है. इसलिए कि मैंने उसकी बहन का हाथ पकड़ रखा है. वह कुछ कह भी न पाई. उसने हमारे बीच जगह बनाने के प्रयास भी नहीं किये थे. वह चलते चलते शायद अपनी उपेक्षा से रोने लगी. वह थक कर बैठ गयी है. उसकी आँखों में आंसू है. वह किशोरवय की कार्टून प्रेम कहानियों के एक उदास चरित्र सी किसी शक्ल में ढल गयी है. मैं और उसकी बहन उसे सहारा देकर उठा लेना चाहते हैं. अचानक पीछे छूट गए मॉल के आगे की सड़क अधिक सूनी हो गयी. माँ हमारे साथ नहीं है. मैं खड़ा हूँ, उसकी बहन पश्चिम की ओर देख रही है, मेरी दोस्त ने अभी अपना सर उठाया नहीं है...

* * * 

ये दो स्वप्न ताज़ा रील के टुकड़े हैं. इस यात्रा में कथानक और दृश्य अक्सर जम्प करते हुए नए स्थानों पर पहुच जाते हैं. इन्हें अपने इस रोज़नामचे में इसलिए दर्ज़ कर रहा हूँ कि कुछ भी बिना वजह नहीं होता है. मौसम में कल रात का सुरूर बाकी है. ज़िन्दगी, जंगल में भटक रहा एक शिकारी है, जिसकी बन्दूक में समय नाम का बारूद भरा है. मेरी मैगज़ीन में हसरतों के बूमरेंग रखे हैं. बेआवाज़ लौट लौट कर आते हैं, मेरे पास...

[Painting image courtesy : Laurie Justus Pace]

January 13, 2012

ऑक्सफोर्ड टो वाले शू



बीते साल की कुछ और बेवजह की बातें...

याद की खिड़कियाँ

और ऐसे ही किसी दिन न भूल पाने की बेबसी में
एक से दूसरे कमरे में टहलता रहता हूँ
याद की खिड़कियों पर सुस्ताती गिलहरियों को देखता
बेसबब वार्डरोब को खोले चुप खड़ा सोचता हूँ,
दीवार... दराजें... स्याही... कुहासा...शहर और वीराना
एक विलंबित लय में लौट आता हूँ बिस्तर पर...

फिर
समय की धूल से भरे तकिये पर सर रखे सोचता हूँ
कि रिसाले और किताबें नहीं दे पाते हैं सीख, तुम्हें भूल पाने की
* * *

शुभकामनाएं


वह हद दर्जे का जाहिल था
जींस के नीचे 'ऑक्सफोर्ड टो' वाले शू पहना करता
डिनर से पहले प्रे नहीं करता
सोता था चिपक कर और ओढ़ लिया करता बेड कवर
और उसके आने का भी कोई सलीका न था...

काश ! उसको वेलेंटाइन और फ्रेंडशिप डे की तरह
सिलसिले से साल दर साल आने का हुनर पता होता
ये सोच कर उसने मोबाइल वापस रख दिया है.

ऐसा सोचते हुए मैं भी नहीं कर रहा हूँ फोन
कि बाते बेवजह हैं और बहुत सी हैं..
* * *

January 11, 2012

शाम के टुकड़े


कभी कभी कोई इंतज़ार नहीं होता. चेहरों से उतर जाती है पहचान, स्मृतियाँ कायम नहीं रह पाती. सिटी कोतवाली से कुछ आगे ऊपर की ओर जाती संकड़ी पेचदार गलियों के किनारों को कुछ अधिक काट कर बनाया गया रास्ता ज़रा बायीं तरफ मुड कर ख़त्म होता सा दीखता है. वहीं पर बड़ी हवेली की गोद में राज के कारिंदों के लिए मकान बने हुए हैं. पीछे पहाड़ी का हिस्सा है और सामने नीचे की ओर सर्पिल रास्ते घाटी में खो जाते हैं. इन रास्तों के किनारे बेढब सिलसिले से मकान बुने हुए हैं.

हर शाम घरों के चौक में रखी सिगड़ी से उठता धुंआ पत्थरों की दीवार को चूमता रहता है. इच्छाओं की अनगढ़ सफ़ेद लकीर हवेली की छत तक जाते हुए जाने क्या सोचती हुई, मुड़ मुड़ कर देखती रहती है. सुबह सूरज सिर्फ किले के दरवाज़ों पर ही दस्तक देता. दोपहर की बिना धूप वाली गलियों में तम्बाकू बाज़ार से तीन गली पहले पान वाले से मुनक्का खाते हुए बीता दिन, किसी विस्मृत शहर की तस्वीर सा याद आने लगता है.

ढलुवा पथरीली सड़कों पर आहिस्ता चढ़ते उतरते, याद के पायदानों पर बीते दिनों के पांव नहीं दिखते. एक कड़ा वर्तमान बाहं थामे रखता है. नीले घरों के आगे भांग के ठहाके लगाता, अधबुझी आँखों से नष्टोमोह का उद्घोष करता शहर. नीम अँधेरा उतरता, उससे थोडा पहले भरे बदन वाली कमसिन लड़की बाल्टी भर पानी से घर के आगे का चौक धोती और निवार से बुनी लोहे की चारपाई लाकर बिछा देती. ख़ुद दरवाज़े के पागोथियों पर बैठी शाम के छोटे टुकड़े करती. कुछ स्टील के भगोने में, कुछ गल्टी की परात में और कुछ को अपनी कमीज के जेबों में भर कर अन्दर चली जाती. 

शाम के जो टुकड़े पीछे छूट जाते थे. उनके लिए, उसकी माँ उसे कोसती. कभी कहती थी. "... ज़रा संभाल कर काट डूबते दिनों को, दुःख घने हैं और रास्ता बड़ा संकड़ा है." मगर लड़की पचास सीढ़ी नीचे उतरने के बाद दायीं तरफ के मोड़ पर मिलने वाले एक मुसलमानों के लड़के के बारे में सोच रही होती थी. गाढ़ा कत्थई रंग उसको अपनी बाहों में भरता जाता. वह लम्बी सांसे लेती हुई अंगूठे और तर्जनी से पकड़ कर ढ़क्कन को पतीले से उतार ही लेती. माँ फिर कोसती हुई दरवाज़े से बाहर झांकने लगती मगर दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता था. बड़े नीले रुमाल वाला लड़का सिर्फ़ उस लम्बी चोटी वाली लड़की को ही दीखता था.

"आह, हट जाओ" यह कहते हुए लड़की ने उसके बारे में बताया कि लड़के के खुशबूदार हाथों से बनी सलवटों को उसने लोहे के बक्से के पीछे छिपा रखा है. रात गए अपने कमीज को सूँघा करती है. उसने फिर से दो तीन बार लरज़िश भरी फुसफुसाहट में मेरा नाम पुकार कर कहा. "हटो.." आवाज़ पास बुला रही थी. शब्द कहते थे, चले जाओ. "वह मेरा हर शाम चार बजे इंतजार करता है. कल भी आएगा. मैं जी न सकूंगी, उसके बिना." ऐसा कहते हुए उसने अंगुलियाँ मेरे बालों में डाले रखी. रात का अँधेरा गहरा था.

इसी घर में किसी दीवान के कारिंदे ने कूत से लौट कर आने में कुछ अधिक रातें लगा दी होंगी. फिर शराब के नशे कह दिया होगा कि फलां गाँव की औरतें छः हाथ से ऊंची होती है. उनके नाक तीखे होते हैं और बदन से नदियों के मोड़ लिपटे रहते हैं. शायद सदियों पुरानी इसी एक बात के लिए लड़कियां बेसलीका काटती होगी शाम के टुकड़े और रात को खोजती होगी बची हुई खुशबुओं वाला कोई पुराना पैरहन...

पहाड़ वहीँ खड़े हैं. गलियों के पेच कायम हैं. अधबुझी हसरतों की राख में कभी कभी चमकते हैं, कारिंदों के घर...

January 9, 2012

मर जाने से बहुत दूर


तुम कहां होते हो. जब किसी बहुत पुरानी धूसर स्मृति से जागा कोई अहसास मेरे पास होता है. काश मैं बता सकूँ कि किस स्पर्श की नीवं पर बैठी है उदास चुप्पी. काश तुम देख सको कि किसी के जाने से बदल जाता है, क्या कुछ... कि और एक बेवजह की बात.

मर जाने से बहुत दूर

जनवरी के इन दिनों में सोचूँ क्या कुछ
कि नौजवान डाक्टरनी की खिड़की पर उतरती है धूप
अक्सर साँझ के घिरने से कुछ पहले.

लुहारों के बच्चे होटलों पर मांजने लगे हैं बरतन
आग के बोसे देने वाली भट्टियाँ उदास है
कि अब उस जानिब नहीं उठती है कोई आह
जिस जानिब था मर जाने का खौफ, हमसे बिछड़ कर.

अचानक
ख़यालों के ओपरा में हींग की खुशबू घोल गया है
अभी उड़ा एक मटमैला कबूतर.
और दीवार पर उल्टी लटकी गिलहरियाँ
अब भी कुतर रही है, दाने समय के, जनवरी के इन दिनों में...

January 8, 2012

सपने में एक उदास चिड़िया


यह कोई अच्छी बात भले ही न हो मगर हर सुबह चंद ख़्वाबों के टुकड़े सिरहाने रखे होते हैं. मैं जागते ही एक जिज्ञासु और उम्मीद भरे बच्चे की तरह पहेली को जोड़ कर एक मुकम्मल तस्वीर बनाने में जुट जाता हूँ. वे छोटे टुकड़े आपस में इस तरह गुम्फित होते हैं कि कोई सिरा सही से पकड़ में नहीं आता है. उनका फलक व्यापक और तत्व विस्मयकारी होते हैं. उन सपनों को खोल पाने के लिए मैं सबसे पहले अपनी जेब टटोलता हूँ. जिसमें कुछ कामनाएं रखी रहती हों. मैंने ऐसा सुन रखा है कि सपने अक्सर हमारी अपूर्ण इच्छाओं और उनके दायरे में रखी हुई अवचेतन सोच के प्रतिनिधि होते हैं.

मैं अपने असंख्य सपनों को दर्ज़ कर सकता था मगर उन दिनों ऐसी डायरी लिखने की सुविधा नहीं थी. मेरे पास हर समय एक रजिस्टर हुआ करता था. उसमें कुछ बेहद निजी बातें लिख लिए जाने के कारण वह रजिस्टर गोपनीय दस्तावेज हो जाता था. उसका अंज़ाम तय था कि वह जीवन का हिस्सा बन कर साथ नहीं रह सकता था. मेरी बहुत सी बेवजह की बातें उसके साथ ही नष्ट हो गयी. मुझे प्रकाशन उद्योग और लेखकों से नफ़रत नहीं है मगर उनके बारे में बात करके भी ख़ुशी नहीं होती कि वे सब आत्ममुग्ध और हुक्मरान होने जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं.

रजिस्टर के साथ बेवजह की बातें और कहानियों के ड्राफ्ट खो गए. मैं अपने सपने याद नहीं रख पाया इसके सिवा मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ. मैं अब भी उस दुनिया का हिस्सा नहीं हूँ और मुझे ख़ुशी है कि नए किस्म के औजार आ गए हैं. अब आप ब्लॉग और पर्सनल डोमेन के जरिये अपने दिल की बात कह सकते हैं. हमारी बातें किसी के लिए उपयोगी होगी तो पब्लिकेशन वाले उसका बेहतर उपयोग भी कर लेंगे. मेरे दो तीन चाहने वालों ने ऐसा किया भी है कि ख़ुद तकलीफ़ उठा कर मुझसे लिखवा कर पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय पन्ने के पहले लेख और कवर स्टोरी की तरह छाप दिया है. खैर मैं सपनों के बारे में बात कर रहा था. मैं हर सपना जया या बच्चों को सुनाया करता हूँ ताकि उसको लिखे जाने तक सलीके से याद रखा जा सके.

तीन रोज़ पहले का एक सपना जिसे नए साल का पहला ख़्वाब भी कहा जा सकता है. छत पर छोटे सरकार के साथ पतंग उड़ा रहा हूँ. मुझे पापा ने कभी ऐसा नहीं करने दिया. इसलिए संभव है कि यह मेरी कामना रही होगी कि कभी ऐसा कर सकूँ. मैंने कहा, हम इस पतंग की डोर पर चिड़ियाओं को बैठने देते हैं. फिर उनको गोल गोल घुमाएंगे. हमने ऐसा ही किया. दो चिड़िया डोर पर बैठी. वे कुछ देर गोल घूमने के बाद बारी बारी से उड़ गयी. उनके बाद एक सफ़ेद फ़र वाली बहुत ही कोमल चिड़िया आकर डोर पर बैठ गयी. 

वह एक सोफ्ट टॉय जैसी थी. जिसमें प्राण फूंक दिए गए हों. उसके एक ही पैर था. जो नीचे से गोल था. मैंने उसे हाथ में लिया और छत से नीचे चला आया. रसोई के आगे खड़े हुए बेटे के एक दोस्त ने कहा अंकल ये तो खिलौना है. तभी मैंने उसके मुंह की तरफ देखा. वह एक सजीव छोटी बच्ची का मुंह था. उसकी आँखें बहुत प्राणमय थी. उसके चेहरे पर कुछ छोटे छोटे गड्ढे थे. जैसे अक्सर पिम्पल्स से हो जाया करते हैं. एक तीखी नाक थी. ऐसी नाक जो कार्टून चरित्रों में होती है. इम्प्रेशन कुछ ऐसा था कि वह बहुत उदास थी. उसे नींद आ रही थी या फिर शायद वह आधे होश में थी. मैंने उसके चहरे को अपने कंधे पर रख लिया ताकि वह आराम से सो सके.

उस वक़्त सुबह के छः बज रहे थे. बच्चे उठ कर मेरे बिस्तर पर चले आये. मैं रजाई को ओढ़े हुए बैठा था. मैंने गोद में बेटे को बिठाया और सबको अपना सपना सुनाया. इसके बाद बच्चे और जया स्कूल चले गए, अबूझ सपना मेरे कंधे पर बैठा रहा. मेरी समझ के औजार जिन जेबों में रखे होते हैं. वहाँ से कोई उत्तर नहीं मिला.

January 7, 2012

रात में घुल आई सियाही है



एक पाँव दूब पर रखे, दूजा कुर्सी पर टिकाये कुछ भी सोचना बेकार था. कल रात के एक ख़याल की याद तारी थी कि उसने अपनी नाक तक ओढ़ रखा है, लिहाफ. मेरी नज़्मों को पढ़ कर दिलाती है याद कि कहानियां लिखा करो. मैं कहानी के किरदारों से दोस्ती करने से डरता हूँ कि उनकी दुनिया से लौटने का मन नहीं होता. यह विपश्यना में जाने से पहले के द्वंद्व में अटक जाने जैसा काम है. मैं बोलता भी नहीं और कई सारे पात्र मुझमें ही बोलते रहते हैं. कथाओं के किरदारों का सरल होना बेहद कठिन है और जीवन की भूल भुलैया के उलझे हुए अप्रत्याशित रास्ते बेहतर है. फ़िलहाल एक और बेवजह की बात कि बरबाद जवानी की इमारत अक्सर वैभवशाली बचपन की खूबसूरत नींव पर ही खड़ी होती है.


वाश बेसिन के आईने से पोंछते बीते दिनों को
भीगे गुलाबी होठों पर आता तो होगा, किसी नज़्म का मुखड़ा
कुरते की सलवटों से झांकती बेचैन नींद और रात की उतरनों को देखते
कभी ये भी आएगा ख़याल
कि उड़ ही जाती है खुशबू उम्र की, उसके बिना या इसके साथ.

जब भी काट लेगा कोई, ज़िन्दगी की जेब से एक दिन
सुकून के सोफे पर पसारे पांव सोचेगी, अब कौन मिलता है राह में.

डायनिंग टेबल पर दिखेगी ऐसे कि खा रही है खाना रात का
और फिर उठ जाएगी वार्डरोब में करीने से रखने, आने वाले कल का दिन
ख्वाहिशों को झटक कर खिड़की से बाहर, खींच देगी कोई एक पर्दा भारी.

मगर फिर भी
मुसलसल बरसती वक़्त की गर्द में बची रह जाएगी, उन दिनों की कोई उम्मीद
बुझ न सकेगा दरवाज़े की आड़ में लिया, इश्क़ के नूर से दमकता हुआ कोई बोसा.

सोचता हूँ कि अब सो ही जाओ तुम कि रात में घुल आई सियाही है
कि बातें बेवजह हैं और बहुत सी है.

* * *
[Painting image courtesy : Marianne Konvalinka]

January 6, 2012

रेवड़ी के ठेले


बेवजह की बातें जो इस ब्लॉग की किसी पोस्ट में शामिल नहीं है.

सलाह

मित्र, मैं कल सुबह से बड़ा उदास हूँ
बावजूद इसके तुम्हें इक नेक सलाह देना चाहता हूँ कि
डूबते उजालों को देख उसकी याद में संजीदा न होना.

सोचना उन दिनों को जब गालों को गरम हवा चूमती थी ...
शाम के बुझने से पहले छत का मौसम जेबों में भर आता था
और हाथों के तकिये पर सर रख कर सो जाते थे.

काश मुहब्बत लोकगीतों सी अनगढ़ न होकर
घरानों के बड़े ख़याल की बंदिशें होती जिसे नियम से सीखा जा सकता.
* * *

ख़त जो लिखा नहीं

मैंने तुम्हें एक ख़त लिखा है.
उसमें मजाज़ की इक नज़्म लिखी
और पास रह कर दूर हो जाने का हुनर लिखा है.

एक आईने का बयान है उसमें
कि टीन ऐज़ के मुहासे के धब्बे जैसी तेरी याद
हमेशा मेरे साथ रहती है. 
फिर कई सालों का फासला लिखा
और ये भी लिखा है कि बहुत चुभती है चुप्पियाँ.

यकीनन, तुम पढोगे उसे मुहब्बत की रौशनी में
और सो नहीं पाओगे किसी भी करवट .
इसे पढ़ कर रो दोगे तुम, यही सोच कर रो पड़ी हूँ मैं.
* * *

January 3, 2012

डिस्क्लेमर : कहना गलत गलत


"उनसे जो कहने गए थे फैज़ जान सदक़ा किये
अनकही ही रह गयी वो बात सब बातों के बाद"

ब्लॉग लिखता हूँ. इसलिए नहीं कि लेखक हूँ इसलिए कि कुछ शब्द मन की कोमल दीवारों से टकराते हुए आवारा फिरते हैं, उनको सलीके से रख देना चाहता हूँ. कवि नहीं हूँ मगर कुछ बातें साफ कहते हुए मन को असुविधा है. इसलिए उनको बेवजह बातें कहता हुआ, आड़ा तिरछा लिखता हूँ. वे बातें कविता सी जान पड़ती है. उदास नज़्मों और कहानियों की बातें अच्छी लगती है मगर ऐसा भी नहीं कि ख़ुशी को देखे हुए बरस बीते हों.

सुंदर और हुनरमंद लोग अच्छे लगते हैं. मेरे बहुत सारे क्रश हैं. उनके पास होना चाहता हूँ मगर कोई ऐतिहासिक प्रेम करने में असमर्थ हूँ. अब तक जो अच्छा लगा, उससे कह दिया है कि आपसे बहुत प्रेम है. इस शिष्ट समाज के भद्र शब्दों से मुझे परिभाषित नहीं किया जा सकता है. इसके लिए अनेक शब्द हैं जो मुझे बयान करने के लिए कई बार जरुरी हो सकते हैं जैसे लम्पट, नालायक, बे-शऊर आदि...

हथकढ़ मेरी डायरी है. यह पब्लिक डोमेन में इसलिए खुलती है कि लोग जान सकें कि रेगिस्तान में एक आदमी अपनी तमाम खामियों के साथ खुश होकर जी रहा है. इस डायरी को लिखने की एक और वजह है कि स्मृतियों की जुगाली करने में आसानी होती है. इस ब्लॉग को पढ़ते हुए कभी ऐसा लगे कि बातें बड़ी सच्ची है, प्रेम बड़ा गहरा है, जान कहीं अटकी है और ये मेरे लिए लिखा हुआ है. उस वक़्त खुद को याद दिलाना कि ये सब एक धोखा है.

यह सब जान कर भी प्यार आये तो करते जाना.

* * *

ओ दुखों जाओ भाड़ में कि टीकाकरण का वक़्त हुआ "पल्स पोलियो : दो बूँद ज़िन्दगी की". मूड को ख़राब न करो, नुसरत साहब को सुनो, मेरे लिए ही गा रहे हैं... लव यू बाबा.

January 1, 2012

एक तुम्हारे नाम का अक्षर


नए साल के लिए मैं कुछ शुभकामनाएं चुन लेता मगर जॉन लेनोन, वूडी एलेन, मार्क ट्वेन चुप थे, मजाज़, फैज़, ग़ालिब और मीर सब चुप थे इसलिए एक बेवजह की बात लिख कर ये दुआ करता हूँ कि इस दोशीज़ा साल से तुम्हारा इश्क़ कायम रहे.

एक तुम्हारे नाम का अक्षर

खिड़की के पार बर्फ के रेशे थे, ख्वाहिशों के उड़ते फाहे थे
मगर नाच की आखिरी लरज़िश के बाद
डाल पर झूलती चिड़िया ने गाये एक गीत के कुछ मिसरे.

अँगुलियों से फिसल कर अब, रजाई की ठंडी तह पर गिरा है मोबाइल
कि तुम्हारे नाम के पहले अक्षर से आगे लिखा नहीं गया कुछ भी.

दीवारों पर यादों का सफ़ीना है, लिहाफों में उदासी है
कह तो दूँ सब तुमको मगर बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं.

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

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