January 20, 2018

ख़ुशी की गोली

उसने आमंत्रण भरी एक मतवाली करवट ली. उसकी पीठ से थोड़ा नीचे कूल्हे पर हाथ रखते ही डर की लहर दौड़ पड़ी. आंगन पर अधलेटे हुए दिखा कि टेबल के ऊपर से शीशे के उस तरफ चार-पाँच लोग किसी काम में लगे हैं. उनमें से दो आदमी कमर के ऊपर नंगे थे. उन दो बिना बनियान वाले लोगों में से एक उस पार के कमरे के ठीक बीच में खड़ा था. जबकि दूजा दाईं तरफ के दरवाज़े की ओर जा रहा था. 

उनको देखते ही इस तरफ देखा तो मालूम हुआ कि दोनों ने कपड़े न पहन रखे थे. एक दूजे के बदन से सटे हुए उत्तेजना की फिसलन पर थे. अचानक देख लिए जाने का, पकड़े जाने का भय पसर गया. इसी भय में कपड़े तलाश किये. वे जाने कहाँ गुम थे. हड़बड़ी में खड़े होकर दरवाज़े की ओर लपककर हत्थी पकड़ कर खींची और बाहर आ गया. 

उस दरवाज़े से बाहर आने ने बेहद हल्का कर दिया था मगर उसी पल दस एक आदमी आये. जिस कमरे से भागा था, वापस उसी कमरे खड़े पाया. नया काम होने लगा. वे लोग कालीन उखाड़ रहे थे. उनसे कहा- "इस कालीन को पूरा ही उखाड़ दो." उन्होंने कबूतरी कालीन उखाड़ा तो नीचे एक गहरे हरे रंग का कालीन चिपका हुआ दिखने लगा. 

ऐसा लगा कि गहरे हरे रंग वाला कालीन ही सबसे पहले इस कमरे में लगा था. लेकिन याद में वही प्लास्टिक की टाइल्स वाला आँगन था जिस पर फर्राश महीने दो महीने में पोलिश करता था. वह चिकना आँगन कुछ दिन चिपचिपा सा दिखता और फिर जाने कहाँ से बंद कमरे में गर्द उतरती रहती. आँगन पर एक धूसर पपड़ी जमने लगती. कभी जमादार आता था तो झाड़ू लगा देता था. लेकिन झाड़ू से लकीरें बन जाती. 

कमरे में जगह बन आई. कामगारों से कहा कि इस टेबल को पीछे धकेल दो ताकि इसके आगे भी लोग बैठ सकें. आमने-सामने बैठकर बात कर सकें. वहां इतनी जगह बन आई थी कि अब आराम से कुर्सियां लग सकती थीं और आस-पास खाली जगह भी बची थी. 

वह सुनील नहीं था. उसका कद बराबर था. उसने कुछ हँसते हुए कहा. उसको जवाब देने के लिए मन में छुपे डर पर साहस बांधकर कहा कि तुम अपने बाप की उम्र के आदमी से मजाक करते हो. कल के लड़के हो और इस तरह कंधे पर हाथ रखकर चलने कि हिम्मत कैसे हुई? दाढ़ी वाले लड़के ने हार मान ली थी. उसने झगड़ा करने की जगह स्वीकार कर लिया कि ऐसा नहीं करना चाहिए था. 

रेगिस्तानी क़स्बो में नए मोहल्लों की बसावट जैसा रास्ता था कि हितेश के हाथ से सिगरेट गिर पड़ी. वह आधी टूट चुकी थी. उसे झुककर उठाता उससे पहले ही देख लिया कि बाकी की सिगरेट अब काम की नहीं रही है. बाईं तरफ कोई दूकान न थी. लगा कि अब यहाँ कहाँ सिगरेट मिलेगी. अचानक दाईं तरफ एक भरा पूरा किराणा का स्टोर दिखा. बोरियों में भरा अन्न और मसाले. कोने में रखे झाड़ू. एक ख़ास गंध में डूबा हुआ सबकुछ. उसी दढ़ियल नौजवान ने सिगरेट आगे की. सिगरेट लेते हुए पाया कि ये वही ब्रांड है. जिसकी तलब थी. उसे कैसे मालूम हुआ?
* * *
जागते ही पाया कि वह नंगे बदन औरत कहाँ गयी? वे सारे काम क्या हुए? माँ और बच्चों के साथ चलते हुए दफ़्तर के लोग अचानक कैसे साथ हो लिए. 

पड़ोस में एक आदमी दो दिन से शैय्या पर है. उसके परिवार वाले जुट गए हैं. वे चारपाई के आस-पास बैठे रहते हैं. मोहल्ले में एक बात चुपचाप घूम रही है कि गले का केंसर है और मरने वाला है. मैंने भी आते-जाते दो तीन बार उस पर नज़र डाली. लेकिन वह जाग नहीं रहा था. उसका सर या तो चादर से ढका होता या उसकी आँखें बंद होती. 
* * *

मैं अपने आपको हाथ पकड़ कर कहीं ले जाता हूँ. यहाँ बैठो. इसे देखो. इसे पढो. मैं अपना कहा नहीं मानता. मैं उठकर उधर चल देता हूँ जिधर उलझनें हैं. जिधर एक ही बात रखी है कि किसलिए कुछ करना चाहिए. मरना है तो मर जायेंगे. मरने के मामले एक ही भयावह बात है कि जब भी ऐसा गहरा ख़याल आता है तब लगता है कि ये सब पीछे छूट जायेगा. यहाँ कभी लौटना न होगा. 

साँस उखड़ जाती है. पसीना होने लगता है. लगता है सीने के आस-पास किसी ने कुंडली मार ली है. बदहवास उठकर बिस्तर पर बैठ जाना और चलाकर बाहर आ जाना. इसके सिवा कोई रास्ता नहीं होता. सामान्य होने में बहुत देर लगती है.
* * *

उसने कहा था- "ये ख़ुशी की गोली है." उसे सुनकर देर तक मुस्कुराया. जो कोई दवा कुछ भुला देती है वह सबके लिए ख़ुशी की गोली है.

January 13, 2018

ओ शैदाई !

शैदा का अर्थ है जो किसी के प्रेम में डूबा हो.

सोचता हूँ कि मैं किसका शैदाई हूँ. सतरंगी तितलियों, बेदाग़ स्याह कुत्तों, चिट्टी बिल्लियों, भूरे तोतों, कलदुमी कबूतरों, गोरी गायों, चिकने गधों, ऊंचे घोड़ों, कसुम्बल ऊँटों से भरे इस संसार में कोई ऐसा न था, जिसके लिए जागना-सोना किया. पढने-लिखने में कोई तलब इस तरह की न थी जिसके बारे में बरसों या महीनों सोचा हो कि ऐसा हो सका तो वैसा करेंगे. रास्ता कोई ऐसा याद नहीं पड़ता जिस पर चलने के लिए बेक़रार रहा. मंज़िल भी कोई ऐसी न थी जहाँ पहुँच जाने लिए टूट कर चाहता रहा हूँ. हाँ कभी-कभी जहाँ जाना चाहा वह मेरे नाना का घर था.

मेरे नाना के घर में बहुत सारी बिल्लियाँ थीं.

उनके पास एक चिलम थी. एक ज़र्दा रखने की तिकोनी पोटली थी. चिलम को उल्टा करते तो एक काला पत्थर उसके मुंह से बाहर गिरता था. नाना उसे दो-तीन बार आँगन पर पटकते, अँगुलियों से सहलाते और वापस चिलम के मुंह में रख देते थे. उस चिलम की गंध नाना के कपड़ों से आया करती थी. नाना और चिलम की गंध एक ही थी. मुझे लगता था कि नाना चिलम के शैदाई हैं.

नाना ने किसी रोज़ चिलम को किनारे रख दिया. उनकी बंडी की अगली जेब में एक पुड़िया रखी रहने लगी. उसमें अमल रखा रहता था. नाना ने अमल से मोहब्बत कब की मुझे याद नहीं. इसलिए कि ये उनके आख़िरी बरस थे और तब तक मैं बाहर पढने और फिर नौकरी करने चला गया था. मुझे उन बरसों के नाना बिलकुल याद नहीं है. मैं पिछले बरसों की याद में लम्बी सफ़ेद दाढ़ी, तेवटा, बंडी और कुरता देख पाता हूँ. उनका पोतिया अक्सर ढीला रहता था. वे उसके साथ बेरुखी से पेश आते थे.

नाना एक विवाह में गए. सुबह जब नहाकर आये तो पाया कि बंडी की अगली जेब से अमल का मेणीया गायब है. नाना ने गहरे गुस्से में डेरे पर उद्घोष किया- "सगों के घर में मुझ सत्तर साल के आदमी से कोई मजाक करे ये हद है. आज के बाद इस अमल के पीछे सात धोबे धूड़" उन्होंने उस दिन के बाद से न कभी अमल लिया न चिलम की ओर मुंह किया.

वे बहुत उदास हो गए थे और उनका जी दुनिया से उचट गया था. अक्सर अकेले रहते. कम बोलते और खेतों के दूर तक चक्कर लगाया करते. वे ऐसे ही उदास गुज़र गए.

सोचता हूँ कि कभी नाना चलते-चलते जब अचानक रुक जाते होंगे तब उनको चिलम की पुकार सुनाई पड़ती होगी- "ओ शैदा मुंह लगाओगे या नहीं"

मैं किसका शैदाई था? दुबली सी लड़की या विल्स नेविकट की खराश, सुघड़ व्हिस्की से उठती मादक गंध या फिर उदासी से भरा कोई एकांत या रोने के लिए बनी खुली जगह? ऐसी कौनसी चीज़ थी जिसके लिए मैं शैदाई रहा होऊंगा. मैं अतीत में फिसलता हूँ मगर याद नहीं आता. जो कुछ याद आता है उसमें जिस किसी से मोहब्बत थी और वह जब मेरी शर्त से बाहर हुई तो उसे ठुकरा दिया.

दो रोज़ से बेचैन हूँ. मुझे समझ ही नहीं आता कि मैं कर क्या कर हूँ? ज़रा रूककर सोचता हूँ कि देखो कितने लोग इस रास्ते से आये और सदा के लिए चले गए. दुनिया मगर इसी तरह चल रही. क्या इसी तरह ऐसा नहीं हो सकता कि मैं सीख जाऊं कि कितने ही अफ़सोस इस दिल में आये और चले गए. दिल पहले की तरह चलता रहेगा. लेकिन मैं अपनी प्रिय चीज़ों से दूर भागता हूँ. उनको सदा के लिए ठुकरा देने के ख़याल से भरा अजगर की तरह अपने मन को कुंडली बनाये रगड़ता रहता हूँ. मैं जानता हूँ कि इस तरह एक बार फिर वैसा हो जाऊँगा. नीम पागल, बेचैन, बेक़रार और उदासी के बतुलिये में उड़ते आक के टूटे पत्ते सा... मगर क्या करूँ?

अली अकबर नातिक़ की लोककथाओं सरीखी दो कहानियों में नायक अपनी पालतू कुतिया और दो कुत्तों के शैदाई हैं. वे उनके लिए जीते हैं और उनके लिए मरते हैं. जीवन का ऐसा खाका केवल वे बातपोश खींच सकते हैं जिन्होंने अपने नाना-नानी से कहानियां सुनी हो. जिन्होंने मजदूरी और खेती की हों.

मुझे भी कभी नसीब हो कि ऐसे किसी लोककथा से प्रेम में पड़ जाऊं. कोई पूछे- "शैदा अब क्या होगा?" कोई जवाब न देकर मैं चुप देखता रहूँ कि घर की बाखल में हवा भंवर खा रही है. झोकाणे में ऊंट शांत बैठा है. भेड़ों के गले बंधी पीतल की घंटियाँ बज रही हैं. गुडाल के किसी कोने में बिल्लियाँ ऊंघ रही हैं. बच्चे किसी खेल में रमे हैं. ज़िन्दगी की भागदौड़ खत्म हो गयी है.

मैं इस तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी को शाप देता हूँ.

आमीन.

December 26, 2017

ऊधो, मन माने की बात

कच्ची धूप आ गयी है। चारपाई पर बैठ कर आभा कक्षा छठी की हिंदी की उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगी। पहला वस्तुनिष्ठ प्रश्न था। सूर के पद किस भाषा में हैं। मेरी ओर देखते हुए कहती हैं- "सूर की भाषा"

मुझे लगता है बिना पूछे ही प्रश्न कर लिया है। हिंदी साहित्य का कक्षा से अधिकांश अनुपस्थित रहा विद्यार्थी तुरन्त उत्तर देता है- "ब्रज भाषा" मेरा उत्तर सुनकर सन्तुष्ट हो जाती हैं। उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगती हैं। इस कार्य के बीच आँख उठाकर मुझे देखती हैं। जैसे कह रही हों कि आपकी यही दुनिया है मोबाइल और सोशल साइट्स।

ये समझकर मैं आरम्भ हो जाता हूँ।

मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात॥
ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।
सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात॥

पद को उदघोषक की तरह स्पष्ट शब्द स्वर में पढ़ता हूँ। वे मेरी ओर देखती हैं। मैं व्याख्या करने लगता हूँ। भ्रमर सूखी लकड़ी में घर बनाना है किंतु वह कमल की पंखुड़ियों में क़ैद हो जाता है। जैसे पतंगा अपना हित समझकर स्वयं दीपक की लौ से लिपट जाता है। सूर जिसका जिसमें हित अथवा मन होता है उसे वही सुहाता है।

अभी तक सब कुशल मंगल है।

[Picture credit : Parul Pukhraj]

December 24, 2017

भीगे सलवटों भरे बिस्तर

किसी को छू लेने की, चूम लेने की, बाँहों में भर लेने की या साथ रह लेने की इच्छा होने पर लोग झूठ बोलने लगते हैं कि मुझे तुमसे प्रेम हो गया है।

इन झूठ से जितना जल्दी हो सके बाहर आना ताकि अपना समय और मन बरबाद होने से बचा सको। ताकि एक दिन झूठ का कालीन फट जाने पर पश्चाताप से न भर जाओ। ताकि कोई तुम्हारा नाम लेकर रोये नहीं कि तुमने प्यार-प्यार कहकर एक दिन छोड़ दिया।

मैंने ये कब सीखा. 

चाहना और प्रेम की धूमिल पहचान के बीच बनते-बिखरते सम्बन्धों के बीच निराशा, हताशा और अवसाद में कुछ साफ़ समझा न जा सकता था. अगर केवल चाहना भर थी. अगर उसे केवल देह के संसर्ग से पूर्ण हो जाना था तो हम उसे कुछ और कहकर क्यों पुकारते गये. अगर प्रेम था तो कहाँ गया? 

देह के आमंत्रणों और उपभोग के बाद मन उचट जाता है. बस यही सब करना है? तो इसके लिए दुनिया भर की परेशानी नहीं उठानी. ये लम्हा आएगा और बीत जाएगा. जितनी बार आएगा उतना अपना असर खोता जायेगा. एक रोज़ सम्बन्ध और उससे बड़ी बात कि प्रिय को सदा के लिए खो देना. 

तो क्या ये सब नहीं करेंगे?

मैं समझ ही नहीं पाता मगर खुद से कहता हूँ कि जो मन आये करना किन्तु इंतज़ार करना. अपने आप होने देना. वह सबसे अच्छा होता है. हालाँकि वह भी होकर मिट जायेगा. एक पतली रोशनी की लकीर जैसी स्मृति बची रहेगी. उसके साथ चलते हुए तुम उन बीते दिनों तक पहुँच पाओगे जहाँ कभी थे. 

उत्तेजना, मादकता, नीम थकान और पसीने से भीगे सलवटों भरे बिस्तर. 

ज़िन्दगी को साबुत रखकर क्या करोगे. रख भी कैसे पाओगे. वह प्रतिपल नष्ट हुई जाती है. इसे जी लो. कभी याद की गली में फेरा दे सको. कभी मुस्कुरा सको, कभी पा सको वही गंध. प्रेम वस्तुतः स्वप्न है या फिर स्मृति.

[Picture credit : Parul Pukhraj]

December 19, 2017

चाहना की प्रतिध्वनि

उसके होठों के छोर पर दो गोल बिंदियाँ रखीं थीं. उनको देखते हुए मैं एक अँधेरे में फिसलने लगा. 

अचानक किसी ने मेरा हाथ थाम लिया. मैं ही अपने सामने मेरा हाथ पकड़ कर खड़ा था और मुझे ही कह रहा था कि कि ऐसे चेहरे जिनके होठों की मुस्कान दो सुंदर गोल बिन्दुओं में सिमटी हों, वे अपनी चाहना उम्र भर किसी को नहीं कहते. 

मैं ख़ुद को कहते देखकर हैरत से भर जाता हूँ. मैं कहने वाले चेहरे की मुस्कान और होठों के सिरे देख लेना चाहता हूँ कि क्या उन होठों के किनारे दो गोल बिंदियाँ बनती हैं? 

लेकिन मैं अपना हाथ छोड़ देता हूँ. 

अँधेरे के भीतर फिसलने लगा. अपने हाथों की अँगुलियाँ खोल लीं. मुझे लगा कि यहीं-कहीं, भीतर गहरे दुःख और स्याह इच्छाएं ढक कर रखीं होंगी. कुछ पल अनवरत आँखें मूँदें स्याह असीमित अँधेरे के संसार में फिसलने के बाद हल्का उजास चारों ओर दिखाई देता है. दुःख और इच्छाओं को छूने की चाहना विस्मृत होने लगती हैं. 

एक लिहाफ के भीतर नीम उजाला. स्याह कुरते पर कोई सलवट नहीं. वह अपनी चमक और अनछुई छवि के साथ एक करवट लेता है. मौन में कोई कहता है कि इस पेट के भीतर असंख्य जटिलताएं हैं. वहां कोई दर्द रखा है क्या? ये सवाल मैं ख़ुद से करता हूँ. शायद मैं पूछता नहीं हूँ, मैं सोचता हूँ कि इस पेट पर अपनी हथेली रख दूँ. क्या मैं शायद खुद को जादूगर समझता हूँ. कोई शिफा है मेरे हाथ में? 

नहीं! मेरे हाथ में प्रेम की छुअन है. प्रेम दुःख के लिए सबसे बड़ा मरहम है.

दो हाथ सामने थे. ये अचरज था. ऐसा अचरज कि हम अचानक कली का चटकना देख लें. नाज़ुक अनछुई पत्तियों की हलकी छवि देखने लगें. उन दो हाथों की अँगुलियों को अपनी अँगुलियों में भर लिया. सहसा एक लहर सी आई और रेत पर बनी उत्तेजना को मिटा गयी. 

मैं खुली आँख से होठों के किनारे की बिंदियों को याद करे लगा.

दोपहर अनमनी थी. कड़ी धूप, खोया-खोया मन और नष्ट हो चुके जीवन राग का मद्धम प्रवाह.

उल्फत ने कहा- "आपके साथ सब कुछ बेहतर है लेकिन आप भीतर से ठीक नहीं है. कहीं उलझे और परेशां से हैं" मैं हामी भरता हूँ. "हाँ ऐसा ही है. सच! मुझसा जीवन एक निश्चिंतता और आनंद का जीवन कहलाता है. लेकिन... यहाँ बहुत सी बेचैनी रखी हैं. ये कारखाना लगातार चलता रहता है. कोई नयी इच्छा, नई आवाज़ खोज लाता है" 

रात दबे पाँव आती है. अचानक मन बेतहाशा भागता है. उसी मुस्कान को देखने के लिए. उन्हीं दो गोल घेरों की छाया में. उन तक भागते हुए लगता है कि समय की कोई सीमा है. वह समाप्त हो जाये उससे पहले पहुँचो. भय, थकान और प्रतीक्षा. 

मैं गिर जाता हूँ. दो बिंदु चमक रहे हैं. मेरे भीतर से कोई उनको पुकारना चाहता है मगर नहीं पुकारता. मैं आहिस्ता से आँखें बंद कर लेता हूँ. वहाँ आंसू नहीं है मगर कुछ है भारी सा. किसी की चाहना जितना भारी. 
* * * 

खुली और बंद आँखों में एक ख़्वाब सिलसिले से बनता है. 

हम अक्सर ज़मीन के नीचे एक सुरंग खोदने लगते हैं. अजाने, बेमकसद उस ओर बढ़ते रहते हैं. उसके बहुत करीब जहाँ से हमारी चाहना की प्रतिध्वनि सुनाई पड़े, वहाँ तक पहुँचकर चौंक जाते हैं. 

मुझे ज़िन्दगी ने सिखाया है कि कोई सबक आख़िरी नहीं है. इसलिए मैं नए भंवर में कूद जाता हूँ. 
* * *
[Picture courtesy : Hannah Aradia]

December 18, 2017

जो तुम नहीं हो

एक ठिठक निगाह में उतरती है. एक पेड़ से थोड़ा आगे बायीं तरफ़ घर दीखता है. घर से इक पुराना सम्बन्ध है. जैसे कुछ लोग होते हैं. जिनसे हम कभी नहीं मिले होते लेकिन उनको अपने सामने पाकर बहुत पीछे तक सोचने लगते हैं. याद का हर आला, दराज़ खोजने लगते हैं कि इसे कहाँ देखा है. ये हमारा पुराना कुछ है. वैसे ही उस घर का दिखना हुआ. 

उस घर के अन्दर एक कॉफ़ी रंग के दरवाज़े के भीतर झांकते ही छोटा शयनकक्ष दिखाई दिया. बायीं ओर दीवार में ज़मीन को छूती हुई रैक के आगे कांच का पारदर्शी ढक्कन लगा था. बैड खाली था. वहां कोई न था कि ध्यान फिर से रैक की ओर गया. वहाँ पीले रंग की माइका का बना फर्श था. उस पर सफ़ेद चूहे थे. कोई दस बारह चूहे. उन चूहों के पीछे कोई छाया थी या एक गहरे भूरे रंग का चूहा था. 

लड़की ने कुछ कहा. मैंने उसे देखा था मगर वह दिखी नहीं थी. जैसे कई बार हम कोई आवाज़ सुनते हुए महसूस करते हैं कि कोई पास खड़ा है और उसी की आवाज़ है. थोड़ी देर बाद पाते हैं कि वहाँ कोई नहीं है. हम स्वयं को यकीन दिलाते रहते हैं कि यहाँ कोई था. उसी ने कहा है. इसी तरह वह लड़की दिखी नहीं. 

मैं उसे जानता था. उससे बहुत दिनों का परिचय था. हम परिचय के मार्ग में इतनी दूर आ गए थे कि एक ही बिस्तर पर सोये हुए बातें करने का निषेध नष्ट हो चुका था. देह कोई लेकर कोई विशेष आग्रह न बचा था. हमने कभी एक दूजे को छुआ नहीं था लेकिन मन के भीतर छू लेना कब का हो चुका था. वह इतना पुराना हो चुका था कि उसे लेकर कोई लज्जा या पश्चाताप न था. 

उस लड़की की बात सुनकर, मैं जाने क्यों कुछ दूर आगे के एक घर में जाता हूँ. वहाँ मुझे लड़का मिलता है. ये वही लड़का है जिसका लड़की से कोई सम्बन्ध जान पड़ता है. ऐसा सम्बन्ध कि जैसे उसका लड़की पर कोई अधिकार है. वो जो टीनएज का अधिकार हुआ करता है. 

मुझे लगता है कि कुछ गड़बड़ है. मैं कहीं गलत जगह चला आया हूँ. अचानक देखता हूँ कि वे चूहे भी वहाँ हैं. इस बार मुझे सफ़ेद चूहों के बीच गहरे भूरे रंग का चूहा साफ़ दिख जाता है. सफ़ेद चूहे अपनी लय और सोच में खोये होते हैं जबकि वह अकेला चूहा अपना सर उठकर मेरी ओर देखता है. 

मैं कुछ अपराध कर रहा हूँ. 

मुझे अपराध गंध आती है. उन घरों से बाहर गली में चलते हुए कोई साया हिलता है तो चौंकता हूँ. कोई फर्री हिलती है, कोई बोर्ड रोशनी में चमकता है, कहीं कोई दरवाज़ा जरा खुलता है तो हर आहट, हर विचलन मेरे लिए हुआ जान पड़ता है. 

मैं इस लड़की के जीवन के आस-पास भटक रहा हूँ. जिस तरह उसके घर से चार घर आगे गया था, उसी तरह कुछ घर पीछे के एक घर में चला आता हूँ. पानी के हौद में कुछ डूब गया है. मैं जानता हूँ कि वह कहाँ डूबा है और कौन है. 

लोग सवालियां निगाहें लिए जमा हैं. वे असल में जानते ही नहीं कि क्या डूब गया है मगर उनको इस बात की परवाह है. मैं उस भीड़ से बाहर जाने का सोच ही नहीं सकता. इसलिए कि मैं वो व्यक्ति हूँ जिसे मालूम है. मेरा चला जाना ठीक नहीं है. 

लड़की की पीठ पर हाथ रखे उसे ख़ुद की ओर थामे हुए लम्हे की याद आती है. फिर लगता है कि वह चाहना, रुमान और उत्तेजना उसी पल थी. अब उस लड़की के पास उस अहसास की याद भी ठीक से बाकी नहीं है. 

मैं थक जाता हूँ. 

भय मेरी याद के टुकड़े करता जाता है. मैं इन बेढब और बेतरतीब टुकड़ों को जोड़ना चाहता हूँ किन्तु बिना ज़ोर डाले जिस सलीके में याद आते हैं रख देता हूँ. अपना हाथ मुंह के आगे रखकर हवा को बाहर फेंकता हूँ. सूँघ लेना चाहता हूँ कि मेरी साँस में व्हिस्की की कितनी बासी गंध है. मुझे गंध नहीं आती. पार्क एवेन्यू के किसी परफ्यूम का हल्का झोंका याद आता है. 

मैं हिम्मत करके अपनी कलाई को सूँघता हूँ. जैसे हम किसी खोये हुए प्रिय को याद करते हैं. 

मैं रजाई से बाहर आता हूँ. सीढियाँ चढ़कर छत पर खुली हवा में खड़ा होकर देखता हूँ. सामने पहाड़ी के पार काले बादलों के छोटे फाहे सजे हुए हैं. दायीं तरफ बरफ के रंग के बादलों की लम्बी लकीर है. हवा ताज़ा है. 

मैं कहता हूँ केसी ! तुम यकीन मानो इस एक ही दुनिया में असंख्य दुनियाएं हैं. तुम लगातार संक्रमण में हो. तुम अनेक संसारों के अनगिनत अनुभवों से भरते हो. लेकिन ख़ुद को एक भुलावे में रखते हो कि ये सपना है, जागती आँखों का सोच में खो जाना है, ये किसी का सताना या बिछड़ जाना भर है. 

अच्छा ये भी याद करना कि तुम कितने लोगों के साथ जी लिए हो? तब तुमको यकीन होगा कि जीवन असल में एक जन्म से मृत्यु तक का स्थूल देखा जाने वाला सफ़र भर नहीं है. एक ही जीवन में हम कई बार कितने ही लोगों के साथ जीते हैं और मर जाते हैं. कितने ही सम्बन्ध बनाते और मिटा देते हैं. वे सब अलग-अलग जीवन हैं. 

असल में तुम जिस रोज़ उसकी छातियों के बीच सर रखे हुए अचानक जाग गए और वह सम्बन्ध नहीं रहा, उस दिन तुम मर गए थे. वो जो थी, वह भी उसी पल नष्ट हो गयी. तुम दोनों आगे नए जीवन में चले गये. 

मैं कोई और था जो तुम्हारी बाँहों के पसीने में अपनी नाक घुसाए था. तुम वो लड़की नहीं हो जो मेरे बालों को दोनों हाथों की अँगुलियों में भींचकर अपने करीब किये थी. वे लोग चले गए. वे कोई और थे. तुम और मैं चाहें तो भी उनको लौटा नहीं सकते.

एक बार मैंने पिता को याद किया तो पाया कि अनेक स्मृतियों में पिता के आस पास बैठा हुआ मैं बहुत अलग-अलग था और पिता भी अलग थे. उनको अगली बार याद करूँगा तब वे कोई और होंगे मैं कोई और. 

दुर्घटनाओं को न्योता दो, सम्भव है कोई क्षणिक मुक्ति कहीं प्रतीक्षा करती हो. 
* * *

[Painting courtesy;  Rahul Malpani]

December 14, 2017

क्या सचमुच !

ख़यालों के टूटते ही, किसी काम के ख़त्म होते ही, मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. अभी वर्डपैड को खोलते ही लगा कि एक बार बाहर चला जाऊं. मैंने चारपाई के नीचे देखा. वहाँ मेरे जूते नहीं थे. मैं अपने जूते थोड़ी देर पहले फर्स्ट फ्लोर पर रख आया था. वहाँ से पतले गुलाबी चप्पल पहन कर चला आया. चारपाई के पास वे ही रखे हैं. क्या मैं इनको पहन कर बाहर नहीं जा सकता? देखता हूँ कि एक चप्पल में टूटन है. वह अंगूठे के नीचे की जगह से चटक गया है. चप्पल को देखने से बाहर आते ही मुझे लगता है कि कहीं बाहर चले जाना चाहिए. 

मेरे भीतर से कोई मुझे उकसाता है. मेरे ही भीतर से कोई मुझे लिए बैठा रहता है. 

कहाँ जाऊँगा? 

पलंग से चार हाथ की दूरी पर रखे फ़ोन से बीप की आवाज़ आई. मैंने समझा कि संदेशा आया है. उसमें लिखा है 'हाई'. पता नहीं लिखा क्या है पर मैंने यही सोचा. मैं फ़ोन तक नहीं जाना चाहता. मेरी हिम्मत नहीं है. अब से थोड़ी देर बाद फिर बीप की आवाज़ आएगी. शायद लिखा होगा 'बिजी?" मैं क्या सचमुच बिजी हूँ? शायद बहुत ज़्यादा. मेरा मन गुंजलक है. मेरे पास जवाब खत्म हो गए हैं. मैं केवल इस जगह से या जहाँ भी रहूँ वहाँ से कही बाहर चले जाना चाहता हूँ. 

मैं फ़ोन को देखता हूँ. एक छोटी संकेतक बत्ती चमक रही है. मैं उसे देखता रहता हूँ. उसके फिर से चमकने का इंतज़ार करने लगता हूँ. बत्ती काफी देर से चमकती है. उसके चमकते ही लगता है कि इंतज़ार पूरा हुआ. फिर से याद आता है कि मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. 

मैं अपनी गरदन को एक झटके से बाईं तरफ करता हूँ. एक साथ चार-पाँच कट-कट की आवाज़ आती है. मेरी गरदन अकड़ गयी थी. मैं क्या देख रहा था? मैं दफ़्तर के स्टूडियो में इन दिनों बार-बार बुलाया गया. वहां सीलन नहीं थी. गर्माहट थी. मशीनों की गर्माहट. बाहर की ठंडी हवा से ये जगह अच्छी थी. कुछ लोग काम कर रहे थे. मुझे केवल इतना भर बताना था कि काम बन गया या नहीं? 

वे लोग काम कर रहे थे. मैं उनको देखते हुए सोच रहा था कि क्या सचमुच कोई काम कभी बन जाता है? जैसे अगर मैं किसी से मिलना चाहता हूँ. मैं उससे मिल लूँगा. ये एक काम है. ये एक काम मिल लेने पर बन गया है. क्या सचमुच ऐसा कह सकूँगा? नहीं. पक्का नहीं. वह जो मिल लेना होगा, वह और अधिक अधूरा कर देगा. वह काम और अधिक बाकी हो जायेगा. इसलिए काम बन जाना एक भ्रम है. वह असल में काम का और ख़राब हो जाना है. 

मैं ये सब और नहीं लिखना चाहता. मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. मैं कहता हूँ कि मेरा फ़ोन ऑटो आंसर मोड़ पर आ जाये. वह सबको जवाब देने लगे कि सर्दी इतनी ज़्यादा है और लिहाफों की छुअन के सम्मोहन खो गए हैं.  

हम क्यों किसी के प्यार में नहीं पड़ जाते. इतने सारे तो लोग हैं? 

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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