November 12, 2017

प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त

तुमको इस बात का यकीन न होगा किन्तु ये सच है कि हर व्यक्ति एक ख़ब्त का शिकार होता है। उसी ख़ब्त के साथ जीता है और उसी के साथ मर जाता है। तुम ख़ब्त को सनक समझना या फिर मैडनेस ज्यादा ठीक होगा।

मैं अपनी याददाश्त में जितना पीछे जा सकता हूँ, वहाँ से अपने भीतर एक ख़ब्त पाता हूँ। प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त। इसे प्रेम करना न समझना। बस प्रेम करने का ख़याल या विचार ही समझना। इसलिए कि ये दोनों अलग स्थितियां हैं। ये दो पायदान भी नहीं है। कहीं ऐसा न समझने लगो कि पहले ख़याल आएगा फिर प्रेम किया जाएगा या होगा।

प्रेम करने का, प्रेम के ख़याल से कोई वास्ता नहीं है। प्रेम एक स्वतः स्फूर्त, सदानीरा, असीम शै है। वह जिसके पास होती है, उसे प्रेम करना नहीं पड़ता। उसका प्रेम उसके आचरण में घुला रहता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ कहीं होता है, जिस काम को करता है, वहाँ केवल प्रेम होता है।

प्रेम से भरा व्यक्ति, प्रेम करने के ख़याल से भरे व्यक्ति से अधिक ख़ब्ती होता है। इसलिए कि उसे आने और जाने वाले, बने और बिगड़े हुए से कुछ फर्क नहीं पड़ता। जब कोई जीवन से चला जाता है तो वह घर, बगीचे और दफ्तर से प्रेम करता रहता है। जब वह लौट आता तो उससे प्रेम में बना रहता है। ऐसे व्यक्ति के पास शिकवे नहीं होते। ऐसे व्यक्ति पत्थरों के बीच की घास होते हैं। हर हाल में, अपने स्वभाव में बने रहते हैं।

लेकिन प्रेम करने के ख़याल में होने की ख़ब्त व्यक्ति को कनखजूरा बना देती है। वह अपने ख़यालों के असंख्य पांवों पर भागता फिरता है। अंधेरे कोनों में दुबका रहता है। उसका जीवन प्रेम की रोशनी में कम और इंतज़ार के अंधेरों में अधिक बीतता है। जब वह रोशनी से गुज़रता है तो उसे देखने वाले सब घबराये रहते हैं। उनको लगता है कि वह कहीं उनके प्रेम को अपने नाखूनों से ज़ख़्मी न कर दे। जबकि उसे किसी के प्रेम से वास्ता नहीं होता। क्योंकि वह प्रेम करने से परे रहता है। वह होता है प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त में डूबा हुआ।

असल में प्रेम करने के ख़याल में होना, प्रेम की बारहमासी नदी से अधिक सम्मोहक होता है।

कितने ख़ब्ती, कितनी ही ख़ब्त। जैसे लिखना।

November 11, 2017

यादों की सुरंगें

मैंने अचानक फोन ऑन किया. मुझे याद आया कि कोई मेसेज बहुत दिनों से पड़ा है. उसे जवाब नहीं दिया. बस कॉल किया.

मैंने पूछा- "तुम्हारे पास समय है?"

उसने कहा- "आपको ये नहीं पूछना चाहिए. आपके लिए कभी भी..."

मुझे लगा कि शायद उसने अपने आस-पास देखा होगा. पल भर में लिए तय किया होगा कि बात करे या बाद में फोन पर बात करने का कह दे.

उसने कहा- "आप बहुत अच्छा लिखते हैं"

मैंने कहा- "एक ज़रूरी काम से फोन किया है तुमको"

उसे ज़रूर अचरज हुआ होगा. उसने कहा भी- "मुझसे ?"

मैंने कहा- "हाँ"

मैं सोच रहा था कि उसके चेहरे पर मुस्कान आई है. उसे बहुत कुछ भूल गया है. जितनी परेशानियाँ उसे घेरे रही होंगी, उन पर किसी अविश्वसनीय बात ने बम गिरा दिया है. सब दिक्कतें ढहने लगी हैं.

उसने कहा- "मुझे लगा कि कहीं बैठ जाना चाहिए तो मैंने यही किया है."

मैं चुप रहा.

उसने कहा- "हेलो. आप हैं उधर?"

"हाँ"

"बताइए क्या कहना था?"

मैंने कहा- "मुझे बहुत दिनों से लगता है कि मैंने बहुत सारे चूहे पाल लिए हैं. मैं उनकी ज़रूरतें पूरी करता हूँ. वे दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं.उनके बढ़ने के साथ-साथ मेरे को और ज्यादा काम करना पड़ता है. मैं दफ्तर से भागता हुआ घर आता हूँ. मैं दफ्तर डरा-डरा जाता हूँ. मुझे वहाँ भी लगता है कि चूहे हैं. कोई उनको कुचल न दे. कोई उनको दुःख न पहुंचाए. एक रोज़ मैंने पाया कि चूहे बहुत बढ़ गए हैं. मैं उनके नीचे दब गया हूँ. मैं जिन चूहों से इतना प्रेम करता था. जिनको मैंने इस तरह पाला था. उनको ही लात मार दी. अचानक चूहे, मुझसे दूर एक दूजे पर कूदने लगे."

उसने पूछा- "सचमुच ऐसा है या कोई सपना या कहानी कह रहे हैं?"

मैंने कहा- "ज़रूरी बात ये नहीं है कि ये सपना है या कहानी ज़रूरी बात ये है कि तुमसे पूछना था. मैंने लात मार कर अच्छा किया या नहीं.?"

उसने कहा- "अच्छा किया"

मैंने कहा- "थैंक यू. सॉरी मैं तुमसे इतने दिन तक बात न कर पाया. अच्छा बताओ, तुमको मुझसे क्या बात करनी थी.?"

उसने कहा- "मैंने भी चूहे पाल लिए थे."

फिर हम दोनों हंसे. हमने तय किया कि फिर कभी बात करेंगे. उसने मुझसे पूछा- "क्या जब कभी हम मिलेंगे तो शराब पियेंगे?"

मैंने पूछा- "उससे क्या होता है?"

उसने कहा- "होता कुछ नहीं, बस थोड़ी हेल्प करेगी."
* * *

उससे बात करके मैं सोचता रहा कि एक ही बात को कितने लोग एक ही तरीके से बोलते हैं न. एक लड़की थी. उसने कभी यही कहा था. हम कभी नहीं मिले. ये बात कहने के बाद से अब तक उसका बेटा स्कूल जाने लगा. उसके बेटे को एक छोटा भाई भी मिल गया.

यादों की सुरंगें कहाँ से कहाँ जाती है, कोई नहीं जान सकता. मैंने भी किस याद से बाहर आने को फोन किया और जाने किस याद में जा गिरा.

[Painting image courtesy : Shanna Bruschi]

November 9, 2017

असल में कुछ नहीं हूँ मैं

पहले लोग दुआ सलाम करते हैं। फिर बात करने लगते हैं। उसके बाद अपना मन बांटते हैं। अपने बारे में सब बता देने के बाद जो उनको अच्छा लगा, वह पढ़कर सुनाते हैं। हज़ार बहाने खोजते हैं फोन पर एंगेज रखने के। उनको सुनते हुए। उनसे बात करते हुए। हम भी अपना मन कह देते हैं। फिर अचानक वे लोग कहीं खो जाते हैं। उनसे पूछो तो कहते हैं कि कोई बात है। तुम न समझोगे।

इस तरह अचानक अपनी इच्छा से आये लोग, अचानक खो जाते हैं।

अच्छी बात ये है कि अब तक उन्होंने वे बातें शायद सार्वजनिक न की जो हमने उनकी बातों के बहकावे में आकर कह दी थी।

उनका शुक्रिया।
* * *


मैं आपे से बाहर आया समंदर हूँ
मैं स्याह जादुई रात हूँ
मैं बहुत समय से भूखा शिकारी जीव हूँ
मैं श्मशान में चिता की राख में लेटा अघोरी हूँ.

अनवरत मंत्र पाठ की तरह
संभावनाएं जताता रहूँ अपने बारे में
तो भी जिन अंगुलियों में है
मेरी अंगुलियां छूने की चाहना, वे छू लेती हैं।
 
असल में कुछ नहीं हूँ मैं
हर कोई अपने स्वप्न/दुस्वप्न को छूता है और जाग जाता है।
* * *

November 7, 2017

ख़यालों के अंडरपास

दो साल पहले उसने कहा- "मानव इज हॉट।" फिर मेरी आँखों में झांकते हुए कहा- "बट मिलिंद इज मिलिंद। ही इज अ माचोमैन..." उसके होठों पर मुस्कान और आंखों में शरारत भरी थी।

"अच्छा इस बार मानव कौल दिल्ली आए तो उससे मिलवाना।"
मैंने कहा- "मानव मुझे नहीं जानते"
"रहने दो। ही इज इन योर फ्रेंडलिस्ट एंड रेस्पोंडिंग टू यू"

मैंने देखा कि उसे मेरी बात का यकीन न था। साथ बैठी व्हिस्की पी रही ख़ूबसूरत दोस्त को उदास करना अच्छा न था। इसलिए मैंने कहा- "ठीक है।

साल भर बाद उसने कहा- "बुक फेयर में आये हो मिलोगे?" मैंने कहा कि दिल्ली में मेरा फोन नहीं लगता। बैटरी ड्रेन हो जाती है। नेट पुअर होता है इसलिए मैं वहीं मिलूंगा। न मिलूं तो हिन्द युग्म के स्टाल पर पूछना।"

उसे अच्छा न लगा। ये दोस्त होने जैसा भी न था कि ऐसे तो कोई भी मिल लेगा। वह नहीं आई। मेरे पास भी मेले में वक़्त न था। अचानक उसका मेसेज आया। "शाबाश। मानव कौल का इंटरव्यू कर रहे हो और बड़ी भीड़ लगा रखी है। बहुत अच्छा।"

इस बार मिले तो हम फिर व्हिस्की पी रहे थे। फिर अचानक उसे याद आया। उसने फोन को ऑन किया और दिखाया। "शिट। लुक दिस पिक। मिलिंद अट्ठारह साल की लड़की से डेट कर रहा है।" मैंने उदास मुंह बनाया और कहा। "वह लड़की तुमसी सुंदर भी नहीं है"

फिर हम थोड़ा ज्यादा मुस्कुराए।

कार में कोई एफएम चल रहा था। विद्या बालन कह रही थी मैं हूँ तुम्हारी सुलु... हम दोनों ने एक दूजे की ओर देखा। कहा किसी ने कुछ न था मगर देखने का अर्थ था कि मानव को भी जाने दो। कोई और देखेंगे। इसी चुप्पी में मैंने चाहा कि काश इस रास्ते में फिर से अंडरपास आएं। उनसे गुज़रते हुए ऐसा लगता है जैसे दुनिया ऊपर रह गयी है। हम कहीं गुप्त रास्ते से किसी दूसरे देश जा रहे हैं।
* * *

लव यू मिलिंद। हमतो तुम्हारे चाहने वाले हैं इसलिए रश्क करते हैं। बाकी दिल यही कहता है कि हर कोई उसके साथ हो सके, जिसकी चाहना हो। आमीन।
* * *

[Photograph by Harold Ross]

November 6, 2017

बस एक बार के लिए

किताबों को सोचना अच्छा है। एक-दो किताब आस पास रहे तो एक अजाने संसार में प्रवेश किया जा सकता है। किताबें ऐसी खिड़कियाँ हैं, जो सबसे सुन्दर संसार में ले जाती हैं. 

आप सब किताबें नहीं पढ़ सकते। सबको पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है। आप इस दुनिया मे किताबें पढ़ने नहीं आये हैं। जैसे कोई कुम्हार केवल मृदा पात्र बनाने नहीं आता, लुहार लोहे की चीज़ें बनाने भर को नहीं आता। 

हमारे सम्मोहन होते हैं. हम प्यार करते हैं. हम प्यार करते हुए उसी को जीने लगते हैं. किताबें भी एक प्यार हो सकती हैं. जिसमें इस तरह डूब जाएँ कि हमें और कुछ न सूझे. लेकिन ये डूबना समय के किसी हिस्से के लिए हो सकता है. ये निरंतर होना असम्भव है. अगर संभव है तो फिर सचमुच कहीं कुछ गड़बड़ है. कि तुमने अन्य कलाओं, जीवित पौधों, सुन्दर पक्षियों, बहते पानी, ठहरी झीलों और जीवन के अनगिनत अचम्भों को खो दिया है. नृत्य के प्रेम में आकंठ डूबा एक नर्तक अर्धरात्रि को नाचने का मन होने पर नाच सकता है। द्रुत, अविराम और अनंत नृत्य। किन्तु वह बस एक बार के लिए हो सकता है। उसे फिर से लौट आना पड़ता है, उबाऊ, ढीले और बेस्वाद जीवन में।

जीवन के रास्ते में कुछ भी करते या न करते हुए अचानक भीड़ बढ़ जाती है। तब किसी अंडरपास से निकल जाना चाहिए। एक रोज़ अंडरपास को भी भीड़ शिथिल कर देगी। तब कोई और रास्ता देखना। किसी भी काम मे कभी देरी नहीं होती। ऐसा केवल हमें लगता है कि देर हो रही है। सबकुछ एक गति से चल रहा है। एक रोज़ छुएगा और आगे बढ़ जाएगा। कोई काम जो अधूरा दिखता है, वास्तव में उसका अधूरा होना ही उसकी पूर्णता है। कि वह बस इतना काम ही था।

जब भी कोई आस पास हो तो किताब एक तरफ रख देना। कि पास में बैठा व्यक्ति, जानवर या पक्षी दुनिया की किसी भी किताब से अद्भुत है। वह आपको इतना कुछ दे सकता है, जितना कई क़िताबें मिलकर शायद न दे पाए। 

* * *

November 4, 2017

हम फिर मिलते हैं

वो लम्हा पीछे छूट जाता है। सदा के लिए। एक स्मृति भर रह जाता है। हम जब कभी फिर से मिलते हैं तब हम वो नहीं होते, जो पिछली बार थे। अगर हम वही पिछले वाले होते तो हमारा मिलना असम्भव था। एक बीत चुकी मुलाक़ात दोबारा नहीं हो सकती। नई मुलाक़ात को ताबीर करने के लिए सबकुछ नया बनाना पड़ता है।

हम शायद फिर मिलेंगे लेकिन तुमसे कोई और मिलेगा, मैं किसी और से मिल रहा होऊंगा। मगर इस नएपन के बीज हैं, वे शायद कभी न बदलें। परसों सुबह ब्रेख्त की एक कविता पढ़ रहा था। मुझे लगा कि कई बार तुमसे मिलना चाहिए.

मैं तुम्हारे कॉलेज के दरवाजे के सामने की सड़क के पार बस स्टॉप पर बैठा हुआ देख सकता हूँ। तुम मुझे न देखोगी। मैं एक जाती हुई पीठ पर छितराये खुले बालों से मिल लूंगा। तुम मेट्रो स्टेशन पर आ रही होओगी। मैं इस बार फिर अपनी नज़र फेर लूंगा शायद कि मुझे यकीन न आएगा। तुम इतनी सुंदर कैसे हो जाती हो हर बार। मैं तुम्हारे दफ़्तर को जाती सीढ़ियों पर सामने से आता हुआ टकरा जाना चाहूँगा। ये मगर सम्भव न होगा कि उस वक़्त सब दफ़्तर जा रहे होंगे, दफ़्तर से आ कौन सकता है। इसलिए लन्च में दफ़्तर के निचले तल के पिछवाड़े में केंटीन से राजमा-चावल लिए तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।

हम मिले तो चौंक कर मुस्कुरायेंगे। जैसे अब क्या करें?
* * *

कहीं बहुत दूर से डूबे स्वर सुनाई देते हैं। उन पर ठिठका और ध्यानमग्न हुआ मन, अचानक सुनना स्थगित कर देता है। पूर्णमासी का प्रकाश चीजों को आलोकित करता है किन्तु स्याही के बूटे खिले रहते हैं। धुंधले अनचीन्हे स्वर सुघड़ होने लगते हैं। क्या कोई मुझे ही पुकार रहा है?

मैं देखता हूँ कि चांद ने कोई जादू फूंका है और असर बाकी है।
* * *

November 3, 2017

कि कहां तक

चाय का मग खिड़की के बीच रखा रहता। चिड़िया बालकनी में बंधे तार पर बैठी रहती।

मैं जब भी चाय बनाकर लाता। मग को खिड़की में रखता और चिड़िया को खोजने लगता। कभी-कभी चिड़िया आ जाती थी और कभी देर तक सूनापन बना रहता। फिर मैं सोचता कि क्या एक चाय और बना लूँ?

मैं बार-बार बाहर झांकता कि क्या चिड़िया लौट आई है। बिस्तर पर अधलेटा, कुर्सी में धंसा हुआ होता कि अचानक यकीन आता। उसे आना ही चाहिए कि कहानी में गोली चलने से पहले ही सब मुर्गाबियाँ उड़ जाती थी। वह तो एक चिड़िया जो अपनी मर्ज़ी से बालकनी में आती है।

मैं फिर कहानी के पन्ने को देखने लगता और याद करता कि कहां तक पढ़ा था...
* * *

गुलाब के फूल का गलमा बाहर था. एक बकरी आई और इसके फूलों और पत्तियों को साफ़ कर गयी. तना और शाखाएं बची रह गयी. बस एक गमला था और गमले में सूनी शाखाएं. मैंने कहा कि कोई बात नहीं. अगर ज़िन्दगी बची है तो फिर से हरिया जाएगी. कुछ रोज़ बाद एक नन्हीं सी कोंपल का फूटना दिखाई दिया. दिल ने आराम लिया. जरा आहिस्ता से धड़का. फिर कुछ रोज़ बाद पत्तियां आ गयीं. फिर ये वाला फूल भी आ गया.

दुःख अकसर सबकुछ बुहार कर ले जाता है. मगर हम बचे रहें तो जीवन फिर से खिल उठता है.  
* * * 

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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